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अव॑ स्म॒ यस्य॒ वेष॑णे॒ स्वेदं॑ प॒थिषु॒ जुह्व॑ति। अ॒भीमह॒ स्वजे॑न्यं॒ भूमा॑ पृ॒ष्ठेव॑ रुरुहुः ॥५॥

English Transliteration

ava sma yasya veṣaṇe svedam pathiṣu juhvati | abhīm aha svajenyam bhūmā pṛṣṭheva ruruhuḥ ||

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Pad Path

अव॑। स्म॒। यस्य॑। वेष॑णे। स्वेद॑म्। प॒थिषु॑। जुह्व॑ति। अ॒भि। ई॒म्। अह॑। स्वऽजे॑न्यम्। भूम॑। पृ॒ष्ठाऽइ॑व। रु॒रु॒हुः॒ ॥५॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:7» Mantra:5 | Ashtak:3» Adhyay:8» Varga:24» Mantra:5 | Mandal:5» Anuvak:1» Mantra:5


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर विद्वानों के विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (यस्य) जिसके (वेषणे) व्याप्त व्यवहार के निमित्त (पथिषु) मार्गों में वीर (स्वेदम्) जल को (स्म) ही (अव, जुह्वति) बहाते और (भूमा) पृथिवी के (अह) निश्चित (स्वजेन्यम्) अपने से जीतने योग्य स्थान को (पृष्ठेव) पृष्ठ के सदृश (अभि, रुरुहुः) अभिवर्द्धन करते अर्थात् उस पर बढ़ते हैं उसकी खोज करते हैं (ईम्) वैसे ही आप लोग भी करो ॥५॥
Connotation: - जो मनुष्य मार्ग में व्याप्त व्यवहारों को जान कर कार्यों को सिद्ध करते हैं, वे सुखों को प्राप्त होते हैं ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

पिता की पीठ पर

Word-Meaning: - [१] (यस्य वेषणे) = जिस प्रभु के हृदय में व्याप्त होने पर [विष् व्याप्तौ] ये उपासक (पथिषु) = मार्गों में (स्वेदं अवजुह्वति स्म) = निश्चय से पसीने की आहुति देते हैं, अर्थात् खूब श्रमशील होते हैं 'क्रियावान् एव ब्रह्मविदां वरिष्ठ: '। ये उपासक खाट पर आराम से लेटे हुए नहीं होते। सो (ये ईम्) = निश्चय से (अह) = ही (अभि रुरुहुः) = इहलोक व परलोक दोनों का आरोहण करनेवाले होते हैं, वे (इव) = जैसे कि (स्वजेन्यम्) = अपने से उत्पन्न हुआ हुआ (भूम) = पुत्र (पृष्ठा) = पिता की पीठ पर आरोहण करता है। अभ्युदय व निःश्रेयस के शिखर पर पहुँचकर ये प्रभु को प्राप्त करते हैं, प्रभु की मानों पीठ पर होते हैं, उसी प्रकार जैसे कि पुत्र पिता की पीठ पर ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु का उपासक खूब श्रमशील होता है। अभ्युदय व निःश्रेयस को सिद्ध करके प्रभु की पीठ पर आरूढ़ होता है, जैसे कि पुत्र पिता की पीठ पर ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनर्विद्वद्विषयमाह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! यस्य वेषणे पथिषु वीराः स्वेदं स्माव जुह्वति भूमाह स्वजेन्यं पृष्ठेवाभि रुरुहुस्तस्यान्वेषणं तथा यूयमपि कुरुत ॥५॥

Word-Meaning: - (अव ) (स्म) (यस्य) (वेषणे) व्याप्ते व्यवहारे (स्वेदम्) (पथिषु) (जुह्वति) क्षरन्ति (अभि) (ईम्) (अह) (स्वजेन्यम्) स्वेन जेतुं योग्यम् (भूमा) पृथिव्याः (पृष्ठेव) (रुरुहुः) वर्धन्ते ॥५॥
Connotation: - ये मनुष्या मार्गेषु व्याप्तान् व्यवहारान् विज्ञाय कार्य्याणि साध्नुवन्ति ते सौख्यानि प्राप्नुवन्ति ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - On whose rise, as the sun’s, and in whose service people shed the sweat of their brow in pursuit of the paths of life, to that Agni and the sun, the entire people of the earth look up and rise as children rise on the back of the parent.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The attributes and duties of the enlightened persons are told.

Anvay:

O men ! in whose pervasive dealing or search, hewers make their sweet flow (labor to the maximum) and ascend as on the back of the earth, the portion of which can be conquered and grow harmoniously. You should also do research in the same manner.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Those persons who accomplish their works after knowing the dealings going on their way, enjoy much happiness.
Footnote: Probably the last portion of the translation points out to the importance of research in the Social Forestry.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - जी माणसे मार्गातील व्यवहार जाणून कार्य सिद्ध करतात, ती सुख प्राप्त करतात. ॥ ५ ॥