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ये वा॑वृ॒धन्त॒ पार्थि॑वा॒ य उ॒राव॒न्तरि॑क्ष॒ आ। वृ॒जने॑ वा न॒दीनां॑ स॒धस्थे॑ वा म॒हो दि॒वः ॥७॥

English Transliteration

ye vāvṛdhanta pārthivā ya urāv antarikṣa ā | vṛjane vā nadīnāṁ sadhasthe vā maho divaḥ ||

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Pad Path

ये। व॒वृ॒धन्त॑। पार्थि॑वाः। ये। उ॒रौ। अ॒न्तरि॑क्षे। आ। वृ॒जने॑। वा॒। न॒दीना॑म्। स॒धऽस्थे॑। वा। म॒हः। दि॒वः ॥७॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:52» Mantra:7 | Ashtak:4» Adhyay:3» Varga:9» Mantra:2 | Mandal:5» Anuvak:4» Mantra:7


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (ये) जो (उरौ) बहुत रूपवाले (अन्तरिक्षे) आकाश में (पार्थिवः) पृथिवी में जाने गये पदार्थ (वावृधन्त) अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हैं (ये, वा) अथवा जो (नदीनाम्) नदियों के (सधस्थे) समान स्थान में (वृजने, वा) वा वर्जते हैं जिसमें उसमें (आ) सब प्रकार अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हैं और (महः) महान् (दिवः) कामना करनेवाले वृद्धि को प्राप्त होते हैं, उनको आप लोग विशेष करके जानिये ॥७॥
Connotation: - जो पृथिवी आदिकों की विद्या को जानते हैं, वे सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

त्रिलोकी व नाड़ी संस्थान का स्वास्थ्य

Word-Meaning: - [१] शरीर में प्राण ४९ भागों में विभक्त होकर विविध कार्यों को करते हैं। उनमें कई शरीररूप पृथिवीलोक में, कई अन्तरिक्ष स्थानीय हृदय में तथा कई मस्तिष्करूप द्युलोक में कार्य करते हैं। इनके अतिरिक्त कई नाड़ी संस्थान में गतिवाले होते हैं। इनमें ये जो प्राण (पार्थिवाः) = शरीररूप पृथिवी में स्थित हैं वे (वावृधन्त) = खूब ही वृद्धि को प्राप्त करते हैं। (ये) = जो (उरौ) = विशाल (अन्तरिक्षे) = हृदयान्तरिक्ष में हैं वे भी (आ) [आवृधन्त] = समन्तात् वृद्धि का कारण होते हैं । [२] (वा) = अथवा जो प्राण (नदीनाम्) = इस नाड़ी संस्थान के (वृजने) = बल के निमित्त होते हैं अथवा (महः दिवः) = महान् मस्तिष्क रूप द्युलोक के सधस्थे उस प्रभु के साथ मिलकर बैठने के स्थान में होते हैं, वे प्राण [वावृधन्तः] खूब ही वृद्धि को प्राप्त होते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- प्राण ही इस शरीर की त्रिलोकी को शरीर, हृदय व मस्तिष्क को तथा नाड़ी संस्थान को ठीक रखते हैं।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! य उरावन्तरिक्षे पार्थिवा वावृधन्त ये वा नदीनां सधस्थे वृजने वाऽऽवावृधन्त महो दिवो वावृधन्त तान् यूयं विजानीत ॥७॥

Word-Meaning: - (ये) (वावृधन्त) भृशं वर्धन्ते (पार्थिवाः) पृथिव्यां विदिताः (ये) (उरौ) बहुरूपे (अन्तरिक्षे) आकाशे (आ) (वृजने) वृजन्ति यस्मिँस्तस्मिन् (वा) (नदीनाम्) (सधस्थे) समानस्थाने (वा) (महः) महान्तः (दिवः) कामयानाः ॥७॥
Connotation: - ये पृथिव्यादिविद्यां जानन्ति ते सर्वतो वर्धन्ते ॥७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The heroes of the earth who rise in honour and glory, the winds and currents of lightning energy in the wide wide skies, or the roaring waters flowing in the river beds and around, or the splendour of the regions of light, these are the Maruts worthy of honour and celebration with homage.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The duties of men are elaborated.

Anvay:

O men ! you should know all the good men, who are in the sky or multiform firmament for travel, who are well-known on earth or who grow on the bank of the rivers and in forest. Such men give up all bad habits through good education, and grow desiring the welfare of all and are great by nature and develop their faculties.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Those who know the science of earth and other elements, grow from all sides.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - जे पृथ्वी इत्यादीची विद्या जाणतात त्यांची सर्व प्रकारे वाढ होते. ॥ ७ ॥