अग्ने॑ सु॒तस्य॑ पी॒तये॒ विश्वै॒रूमे॑भि॒रा ग॑हि। दे॒वेभि॑र्ह॒व्यदा॑तये ॥१॥
agne sutasya pītaye viśvair ūmebhir ā gahi | devebhir havyadātaye ||
अग्ने॑। सु॒तस्य॑। पी॒तये॒। विश्वैः॑। ऊमे॑भिः। आ। ग॒हि॒। दे॒वेभिः॑। ह॒व्यऽदा॑तये ॥१॥
SWAMI DAYANAND SARSWATI
अब पन्द्रह ऋचावाले इक्यावनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन विद्वानों के साथ क्या करे, यह उपदेश किया जाता है ॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
प्रभु द्वारा रक्षित होकर 'सोमपान' करना
SWAMI DAYANAND SARSWATI
विद्वान् विद्वद्भिस्सह किं कुर्य्यादित्युपदिश्यते ॥
हे अग्ने! त्वं विश्वैरूमेभिर्देवेभिः सह सुतस्य पीतये हव्यदातय आ गहि ॥१॥
DR. TULSI RAM
ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA
Behaviour of a highly learned person towards other enlightened men is pointed out.
O learned leader ! come with all the protecting enlightened persons in order to drink the juice of the various nourishing herbs. Come for giving articles worth-giving.
MATA SAVITA JOSHI
या सूक्तात अग्नी व विद्वानाच्या गुणाचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
