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दे॒वो भगः॑ सवि॒ता रा॒यो अंश॒ इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॑ सं॒जितो॒ धना॑नाम्। ऋ॒भु॒क्षा वाज॑ उ॒त वा॒ पुरं॑धि॒रव॑न्तु नो अ॒मृता॑सस्तु॒रासः॑ ॥५॥

English Transliteration

devo bhagaḥ savitā rāyo aṁśa indro vṛtrasya saṁjito dhanānām | ṛbhukṣā vāja uta vā puraṁdhir avantu no amṛtāsas turāsaḥ ||

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Pad Path

दे॒वः। भगः॑। स॒वि॒ता। रा॒यः। अंशः॑। इन्द्रः॑। वृ॒त्रस्य॑। स॒म्ऽजितः॑। धना॑नाम्। ऋ॒भु॒क्षाः। वाजः॑। उ॒त। वा॒। पुर॑म्ऽधिः। अव॑न्तु। नः॒। अ॒मृता॑सः। तु॒रासः॑ ॥५॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:42» Mantra:5 | Ashtak:4» Adhyay:2» Varga:17» Mantra:5 | Mandal:5» Anuvak:3» Mantra:5


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! जैसे (देवः) दाता (भगः) ऐश्वर्य्य से सम्पन्न (सविता) प्रेरणा करनेवाला (रायः) धनों का (अंशः) विभाग तथा (वृत्रस्य) मेघ और (धनानाम्) धनों का (संजितः) उत्तम प्रकार जीतनेवाला (इन्द्रः) सूर्य्य (ऋभुक्षाः) बड़ा (वाजः) ज्ञानवान् (उत) भी (वा) वा (पुरन्धिः) बहुत बुद्धिमान् और (तुरासः) शीघ्र कार्य्य करनेवाले तथा (अमृतासः) अपने रूप में नहीं नाश होनेवाले (नः) हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें, वैसे ये आप लोगों की भी रक्षा करें ॥५॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अपने सदृश अन्यों के भी सुख-दुःख, हानि-लाभ, प्रतिष्ठा और अप्रतिष्ठा को मानते हैं, वे ही प्रशंसा के योग्य होते हैं ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

देवों का धारण

Word-Meaning: - [१] (देवः) = प्रकाशमय जीवनवाला (भगः) = सेवनीय धन का स्वामी, (सविता) = उत्पादक, (रायः अंशः) = धन का विभक्ता, (वृत्रस्य इन्द्रः) = वासना का संहार करनेवाला [इन: सन् द्रावयति] ये सब (नः) = हमारे लिये (धनानां सञ्जितः) = धनों के विजेता हों, अर्थात् हम 'देव' आदि को अपने में धारण करके धनों का विजय करें। इन धनों को हम विभक्त करनेवाले हों, ताकि ये धन हमें वासनाओं में फँसाकर हमारा विनाश का कारण न बन जायें। सदा उत्तम मार्ग से ही, पुरुषार्थ से ही, धनों को कमायें। [२] (ऋभुक्षा:) = ज्ञानदीप्ति में निवास करनेवाला (वाजः) = शक्तिशाली, (उत वा) = तथा (पुरन्धिः) = पालक व पूरक बुद्धिवाला ये सब (नः अवन्तु) = हमारा रक्षण करें। (अमृतासः) = ये हमारे अमृतत्त्व [नीरोगता] का कारण बनें और (तुरास:) = हमारे वासनारूप शत्रुओं का संहार करनेवाले हों। हम 'ऋभुक्षा, वाज व पुरन्धि' बनकर अपने को नीरोग व वासना शून्य हृदयोंवाला
Connotation: - भावार्थ- हम 'प्रकाशमयता, ऐश्वर्य, निर्माण, धन संविभाग व वासना- विनाश' आदि गुणों का धारण करें। सदा ज्ञानदीप्ति में निवास करें, शक्तिशाली बनें, पालक व पूरक बुद्धिवाले हों। नीरोग व वासना रहित बनें ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! यथा देवो भगः सविता रायोंऽशो वृत्रस्य धनानां संजित इन्द्र ऋभुक्षा वाज उत वा पुरन्धिस्तुरासोऽमृतासो नोऽस्मानवन्तु तथैते युष्मानपि रक्षन्तु ॥५॥

Word-Meaning: - (देवः) दाता (भगः) ऐश्वर्य्यसम्पन्नः (सविता) प्रेरकः (रायः) धनानि (अंशः) विभागः (इन्द्रः) सूर्यः (वृत्रस्य) मेघस्य (संजितः) सम्यग्जेता (धनानाम्) (ऋभुक्षाः) महान् (वाजः) ज्ञानवान् (उत) अपि (वा) (पुरन्धिः) पूर्वी बह्वी धीर्यस्य सः। (अवन्तु) (नः) अस्मान् (अमृतासः) स्वरूपेणाऽविनाशिनः (तुरासः) शीघ्रकारिणस्त्वरिताः ॥५॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये मनुष्याः स्वात्मवदन्येषां सुखदुःखहानिलाभप्रतिष्ठाऽप्रतिष्ठा मन्यन्ते त एव प्रशंसार्हा जायन्ते ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - May the brilliant and generous, the prosperous and honourable, the creator inspirer, rich and generous, participant sharer, commander of honour and excellence, winner of loud showers, producer of wealth, the powerful intellectual, commander of power and progress, the man of wisdom and distant vision, the immortals and powers of tempestuous advancement, may all these protect and promote us on the path of goodness.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The attributes of learned persons are told.

Anvay:

O men ! as a wealthy donor person, promotes or induces men for good actions, properly distributes wealth of God, conquers cloud-like sinners and wealth, the sun, great and wisemen, (very intelligent ). Let all these who are immortal by their nature and active or prompt protect us. May they also protect you?

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Those men only become praiseworthy who regard happiness, misery, loss-gain, honor dishonor of others as their own.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे लोक आपल्याप्रमाणे इतरांचे सुख, दुःख, हानी, लाभ, प्रतिष्ठा व अप्रतिष्ठा मानतात तेच प्रशंसा करण्यायोग्य असतात. ॥ ५ ॥