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मंहि॑ष्ठं वो म॒घोनां॒ राजा॑नं चर्षणी॒नाम्। इन्द्र॒मुप॒ प्रश॑स्तये पू॒र्वीभि॑र्जुजुषे॒ गिरः॑ ॥४॥

English Transliteration

maṁhiṣṭhaṁ vo maghonāṁ rājānaṁ carṣaṇīnām | indram upa praśastaye pūrvībhir jujuṣe giraḥ ||

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Pad Path

मंहि॑ष्ठम्। वः॒। म॒घोना॑म्। राजा॑नम्। च॒र्ष॒णी॒नाम्। इन्द्र॑म्। उप॑। प्रऽश॑स्तये। पू॒र्वीभिः॑। जु॒जु॒षे॒। गिरः॑ ॥४॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:39» Mantra:4 | Ashtak:4» Adhyay:2» Varga:10» Mantra:4 | Mandal:5» Anuvak:3» Mantra:4


SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब राजप्रजाविषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! जिस (वः) आप लोगों और (मघोनाम्) बहुत ऐश्वर्य्यों से युक्त (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (मंहिष्ठम्) अत्यन्त बड़े और (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले (राजानम्) राजा को (प्रशस्तये) प्रशंसा के लिये (पूर्वीभिः) प्राचीन प्रजाओं के साथ (गिरः) वाणियों को (उप, जुजुषे) समीप से सेवते वा प्रसन्नता करते हो, वे और वह सर्वत्र सुखी होते हैं ॥४॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! जो राजा और जो प्रजाजन परस्पर अनुकूलता अर्थात् प्रीतिपूर्वक वर्त्ताव रखते, वे सदा आनन्दित होते हैं ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'दातृतम' व 'जीवन को दीप्त बनानेवाले' प्रभु

Word-Meaning: - [१] (गिरः) = स्तोता लोग (इन्द्रम्) = परमैश्वर्यशाली प्रभु को (प्रशस्तये) = जीवन को प्रशस्त बनाने के लिये (पूर्वीभिः) = सृष्टि के प्रारम्भ में दी गयी अथवा हमारा पालन व पूरण करनेवाली वाणियों से (उपजुजुषे) = सेवन करते हैं। इन वेदवाणियों का अध्ययन करते हुए वे अपने ज्ञान को बढ़ाते हैं, इस ज्ञानयज्ञ के द्वारा प्रभु का उपासन करते हैं। इस उपासना से सब वासनाओं का विनाश होकर जीवन प्रशस्त बनता है । [२] उस प्रभु का सेवन करते हैं, जो कि (मघोनाम्) = ऐश्वर्यशालियों में (वः) = तुम्हारे (मंहिष्ठम्) = दातृतम हैं, सर्वाधिक दान देनेवाले हैं। तथा (चर्षणीनां राजानम्) = सब मनुष्यों के जीवन को दीप्त करनेवाले हैं। जो भी श्रमशील बनता है, प्रभु उसको दीप्त जीवनवाला बनाते हैं। वस्तुत: जीवन को दीप्त बनाने के लिये सब आवश्यक चीजों को वे प्राप्त कराते हैं ।
Connotation: - भावार्थ– हम वेदवाणियों द्वारा प्रभु का उपासन करें। प्रभु हमें सब आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त कराते हैं और हमारे जीवनों को दीप्त बनाते ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथ राजप्रजाविषयमाह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! यं वो मघोनां चर्षणीनां मंहिष्ठमिन्द्रं राजानं प्रशस्तये पूर्वीभिः सनातनीभिः सह गिर उप जुजुषे ते स च सर्वत्र सुखिनो जायन्ते ॥४॥

Word-Meaning: - (मंहिष्ठम्) अतिशयेन महान्तम् (वः) युष्माकम् (मघोनाम्) बह्वश्वैर्य्ययुक्तानाम् (राजानम्) (चर्षणीनाम्) मनुष्याणाम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यपदम् (उप) (प्रशस्तये) प्रशंसायै (पूर्वीभिः) प्राचीनाभिः प्रजाभिः सह (जुजुषे) सेवसे प्रीणासि वा (गिरः) वाणीः ॥४॥
Connotation: - हे मनुष्या ! ये राजानो याः प्रजाश्च परस्परमानुकूल्ये वर्त्तन्ते ते सदैवाऽऽनन्दिता भवन्ति ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - For the praise and celebration of Indra, greatest of the powerful among you and ruler of the people, offer songs of adoration with the eternal verses of the Vedas as did the ancients for the benediction of the lord and master.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The duties of the kings and their subjects are told.

Anvay:

O men ! the king is the greatest among the men endowed with abundant wealth and whom you also serve with earlier tried speeches With fold people, he and all those who praise him on account of noble virtues enjoy happiness everywhere,

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - O men ! the kings and subjects who act in cooperation with one another or have perfect concord, always enjoy happiness.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - हे माणसांनो! जो राजा व प्रजा परस्पर अनुकूलतेने प्रेमाने वागतात ते सदैव आनंदित असतात. ॥ ४ ॥