Go To Mantra
Viewed 367 times

समि॑द्धो अग्न आहुत दे॒वान्य॑क्षि स्वध्वर। त्वं हि ह॑व्य॒वाळसि॑ ॥५॥

English Transliteration

samiddho agna āhuta devān yakṣi svadhvara | tvaṁ hi havyavāḻ asi ||

Mantra Audio
Pad Path

सम्ऽइ॑द्धः। अ॒ग्ने॒। आ॒ऽहु॒त॒। दे॒वान्। य॒क्षि॒। सु॒ऽअ॒ध्व॒र॒। त्वम्। हि। ह॒व्य॒ऽवाट्। असि॑ ॥५॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:28» Mantra:5 | Ashtak:4» Adhyay:1» Varga:22» Mantra:5 | Mandal:5» Anuvak:2» Mantra:5


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर अग्निदृष्टान्त से पूर्वोक्त विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे (स्वध्वरः) उत्तम प्रकार अहिंसा से युक्त (आहुत) सत्कृत (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! जिस प्रकार से (समिद्धः) प्रज्वलित किया गया (हि) जिस कारण (हव्यवाट्) पृथिव्यादिकों की प्राप्ति करनेवाला अग्नि है, वैसे (त्वम्) आप (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों का (यक्षि) सत्कार करते हो और पालन करनेवाले (असि) हो, इससे श्रेष्ठ हो ॥५॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आदि रूप से अग्नि सब की रक्षा करता है, वैसा ही राजा होता है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

हव्यवाट् प्रभु

Word-Meaning: - १. हे (आहुत) = चारों ओर दानोंवाले [आ हुतं यस्य] (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (समिद्धः) = हृदय देश में दीप्त होते हुए आप (देवान् यक्षि) = सब दिव्यगुणों का हमारे साथ सम्पर्क करते हैं। यह प्रतिदिन प्रभु का ध्यान ही सब दिव्यगुणों का हमारे जीवनों में जन्म देनेवाला है। २. हे (स्वध्वर) = उत्तम यज्ञों के पालक प्रभो! [शोभन: अध्वरः यस्मात्] (त्वं हि) = आप ही (हव्यवाड् असि) = सब हव्य पदार्थों के प्राप्त करानेवाले हैं। जब हम यज्ञात्मक कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, तब उन यज्ञों को सिद्ध करने के लिए सब हव्य पदार्थों को प्रभु कृपा से अवश्य प्राप्त करते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- हम यज्ञात्मक कर्मों में प्रवृत्त हों। इसी से प्रभु की दीप्ति को हृदयों में देखेंगे। इसीसे दिव्यगुण प्राप्त होंगे। यज्ञों के लिए सब हव्य पदार्थों को भी हम प्रभुकृपा से प्राप्त करेंगे। ऋषिः – विश्ववारात्रेयी ॥

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनरग्निदृष्टान्तेन पूर्वोक्तविषयमाह ॥

Anvay:

हे स्वध्वराहुताऽग्ने ! यथा समिद्धो हि हव्यवाडग्निरस्ति तथा त्वं देवान् यक्षि पालकोऽसि तस्मादुत्तमोऽसि ॥५॥

Word-Meaning: - (समिद्धः) प्रदीप्तः (अग्ने) पावक इव (आहुत) सत्कृत (देवान्) दिव्यान् गुणान् विदुषो वा (यक्षि) पूजयसि (स्वध्वर) सुष्ठु अहिंसायुक्त (त्वम्) (हि) यतः (हव्यवाट्) पृथिव्यादिवोढा (असि) ॥५॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । यथा सूर्य्यादिरूपेणाग्निः सर्वान् रक्षति तथैव राजा भवति ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, invoked, kindled and raised to the full in light and splendour, you honour and inspire the nobilities of humanity and feed and replenish the bounties of nature. O noble power of the yajnas of love and non-violence, you are the receiver and disseminator of our oblations and you are the harbinger of the gifts of nature’s bounties.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The same subject by the illustration of the Agni (fire, sun etc.) is continued.

Anvay:

O well-honored king! you observe non-violence well, like the kindled Agni (fire) well, like the upholder of the earth etc. In the same manner, you worship and support the divine virtues and persons. Therefore you are the best.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - The Agni (in the form of the sun, power. energy etc.) protects or sustains all. In the same manner, the king protects and sustains all.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा सूर्यरूपाने अग्नी सर्वांचे रक्षण करतो तसाच राजाही असतो. ॥ ५ ॥