Go To Mantra
Viewed 414 times

तत्सु नः॑ सवि॒ता भगो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। इन्द्रो॑ नो॒ राध॒सा ग॑मत् ॥१०॥

English Transliteration

tat su naḥ savitā bhago varuṇo mitro aryamā | indro no rādhasā gamat ||

Mantra Audio
Pad Path

तत्। सु। नः॒। स॒वि॒ता। भगः॑। वरु॑णः। मि॒त्रः। अ॒र्य॒मा। इन्द्रः॑। नः॒। राध॑सा। आ। ग॒म॒त् ॥१०॥

Rigveda » Mandal:4» Sukta:55» Mantra:10 | Ashtak:3» Adhyay:8» Varga:7» Mantra:5 | Mandal:4» Anuvak:5» Mantra:10


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे विद्वन् ! जैसे (सविता) सूर्य (भगः) सेवन करने योग्य पदार्थसमुदाय (वरुणः) उदानवायु (मित्रः) प्राणवायु (अर्यमा) न्यायकारी (तत्) उस (राधसा) धन से (नः) हम लोगों को (आ) सब प्रकार (गमत्) प्राप्त होता और (इन्द्रः) बिजुली (नः) हम लोगों को (सु) उत्तम प्रकार प्राप्त होती है, वैसे आप हूजिये ॥१०॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! जैसे नियम से सूर्य, वायु, प्राण आदि और बिजुली प्राप्त हैं, वैसे ही आप हम लोगों को निरन्तर प्राप्त हूजिये ॥१०॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१०॥ यह पचपनवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

धन+धन का स्वामी [प्रकृति+परमेश्वर]

Word-Meaning: - [१] उषा (न:) = हमें (तत्) = उस धन को दे, जिस (सुराधसा) = उत्कृष्ट ऐश्वर्य के साथ (सविता) = वह प्रेरक प्रभु (आगमत्) = हमें प्राप्त हो । जिससे (भगः) = वह ऐश्वर्यों का स्वामी प्रभु हमारे जीवन यज्ञ में उपस्थित हो। ऐसा न हो कि ऐश्वर्यों को प्राप्त करके ऐश्वर्यों के स्वामी प्रभु को हम भूल जाएँ। उस प्रभु की प्रेरणा को हम सदा सुननेवाले ही बने रहें । [२] उस ऐश्वर्य के साथ (वरुण:) = वरुण (मित्र:) = मित्र अर्यमा सर्वप्रदाता (इन्द्रः) = ऐश्वर्यशाली प्रभु भी हमें प्राप्त हो । इन वाक्यों से प्रभु का स्मरण करते हुए हम भी निर्दोष [वरुण] सब के प्रति स्नेहवाले [मित्र] त्याग व दान की वृत्तिवाले [अर्यमा] जितेन्द्रिय [इन्द्र] बनें।
Connotation: - भावार्थ- हम धनों को प्राप्त करें। साथ ही धनों के स्वामी प्रभु को न भूलकर 'निद्वेष, स्नेही, दाता व जितेन्द्रिय' बनें । ऐसा होने पर अर्थात् धन के साथ धन स्वामी को न भूलने पर हमारे द्यावापृथिवी, मस्तिष्क व शरीर बड़े उत्तम बनेंगे। इन 'द्यावापृथिवी' का वर्णन अगले सूक्त में है –

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे विद्वन् ! यथा सविता भगो वरुणो मित्रोऽर्यमा तद्राधसा न आ गमदिन्द्रो नः सु गमत्तथा त्वं भव ॥१०॥

Word-Meaning: - (तत्) तेन (सु) (नः) अस्मान् (सविता) सूर्य्यः (भगः) भजनीयः पदार्थसमुदायः (वरुणः) उदानः (मित्रः) प्राणः (अर्यमा) न्यायकारी (इन्द्रः) विद्युत् (नः) अस्मान् (राधसा) धनेन (आ) समन्तात् (गमत्) गच्छति ॥१०॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे अध्यापकोपदेशका ! यथा नियमेन सूर्य्यवायू प्राणादयो विद्युच्च प्राप्ताः सन्ति तथैवाऽस्मान् सततं प्राप्ता भवत ॥१०॥ अत्र विद्वद्गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥१०॥ इति पञ्चपञ्चाशत्तमं सूक्तं सप्तमो वर्गश्च समाप्तः ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - That power, prosperity, honour and excellence for us, may Savita, the sun, Bhaga, ruler of wealth and power, Varuna, the chosen leader, Mitra, the friend, Aryama, the chief of justice, and Indra, commander and controller of power and rule of law and order, may bring us with all wealth and success of excellence and joy.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The attributes of learned persons are stated.

Anvay:

O learned person ! the sun, the group of good articles to be served or taken by us, Udana and Prana, are dispenser of justice. Come to us with their accomplishing power like electricity comes to us. In the same manner, you approach us.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - O teachers and preachers ! as we get regularly the sun, air, Pranas etc. and electricity, in the same manner, approach us constantly.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे अध्यापक व उपदेशकांनो! जसे सूर्य, वायू, प्राण व विद्युत नियमपूर्वक प्राप्त होतात, तसाच तुमच्याकडून आम्हाला लाभ होऊ द्या. ॥ १० ॥