Go To Mantra
Viewed 434 times

उ॒त स्मै॑नं वस्त्र॒मथिं॒ न ता॒युमनु॑ क्रोशन्ति क्षि॒तयो॒ भरे॑षु। नी॒चाय॑मानं॒ जसु॑रिं॒ न श्ये॒नं श्रव॒श्चाच्छा॑ पशु॒मच्च॑ यू॒थम् ॥४॥

English Transliteration

uta smainaṁ vastramathiṁ na tāyum anu krośanti kṣitayo bhareṣu | nīcāyamānaṁ jasuriṁ na śyenaṁ śravaś cācchā paśumac ca yūtham ||

Mantra Audio
Pad Path

उ॒त। स्म॒। ए॒न॒म्। व॒स्त्र॒ऽमथि॑म्। न। ता॒युम्। अनु॑। क्रो॒श॒न्ति॒। क्षि॒तयः॑। भरे॑षु। नी॒चा। अय॑मानम्। जसु॑रिम्। न। श्ये॒नम्। श्रवः॑। च॒। अच्छ॑। प॒शु॒ऽमत्। च॒। यू॒थम् ॥५॥

Rigveda » Mandal:4» Sukta:38» Mantra:5 | Ashtak:3» Adhyay:7» Varga:11» Mantra:5 | Mandal:4» Anuvak:4» Mantra:5


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - (क्षितयः) मनुष्य (भरेषु) संग्रामों में जिस (एनम्) इस राजा को (वस्त्रमथिम्) वस्त्रों को मथनेवाले (तायुम्) चोर को (न) जैसे वैसे (अनु, क्रोशन्ति) पीछे कोशते रोते हैं (जसुरिम्) प्रयत्न करते हुए (श्येनम्) पक्षिविशेष अर्थात् वाज के (न) सदृश (नीचा) नीच कर्मों को (अयमानम्) प्राप्त होनेवाले को और (पशुमत्) पशुओं से युक्त (श्रवः) अन्न वा श्रवण को (च) भी (अच्छ) उत्तम प्रकार (यूथम्, च) तथा समूह के पीछे कोशते रोते हैं (उत, स्म) वही तो शीघ्र नष्ट होता है ॥५॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो राजा प्रजापालन के विना कर लेता है, जिस राजा की प्रजा को दुष्ट जन दुःख देते हैं और जो राजा आप नीच कर्म करनेवाला, वाज पक्षी के सदृश हिंसक, पशु के सदृश मूर्ख और जिस राजा की सेना चोर के सदृश वर्त्तमान है, उसका शीघ्र विनाश होता है, यह निश्चय है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मन, ज्ञान व इन्द्रिय समूह

Word-Meaning: - [१] (उत) = और (स्म) = निश्चय से (एनम्) = इस मन को (अनु) = लक्ष्य करके (क्षितयः) = मनुष्य (भरेषु) = संग्रामों में (क्रोशन्ति) = पुकारते हैं। इस प्रकार हैं, (न) = जैसे कि (वस्त्रमथिं तायुम्) = वस्त्रों प्रभु के चुरा लेनेवाले चोर को लक्ष्य करके । इस प्रकार पुकारते हैं, (न) = जैसे कि (नीचायमानम्) = [नीचै: अयमानं] नीचे झपटा मारते हुए (जसुरिम्) = विनाशक [जस्- to hurt, injure, kill] श्येनम् वाज को लक्ष्य करके । वस्तुत: मन 'वस्त्रमथि तायु' के समान है- 'नीचायमान जसुरि श्येन' के समान है। यदि यह हमारे वश में न हो, तो विनाशक ही होता है। इसको वश में करने के लिए साधक को पुकारते हैं। प्रभु कृपा से ही यह वशीभूत होता है । [२] (च) = और (श्रवः) = अच्छा ज्ञान का लक्ष्य करके प्रभु को पुकारते हैं। (च) = और (पशुमत् यूथम्) = इन पशुओंवाले झुण्ड को इन्द्रिय समूह को लक्ष्य करके प्रभु को पुकारते हैं। यहाँ एक ओर 'मन' है, दूसरी ओर 'इन्द्रिय समूह' । दोनों के बीच में 'ज्ञान' । प्रभु को इन तीनों चीजों का लक्ष्य करके पुकारते हैं। प्रभुकृपा से मन व इन्द्रियसमूह हमारे वश में हुआ, तो ज्ञान तो प्राप्त होगा ही। मन इधर-उधर भटकता है। वस्तुतः भटकता हुआ यह हमारी सब अध्यात्म-सम्पत्ति को चुरा ले जाता है । इन्द्रियाँ भी विषयों में फँस जाती हैं। ये ज्ञानग्रहण व यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त नहीं रहतीं। प्रभु की उपासना ही हमें इन्द्रियों व मन के साथ चलनेवाले इस संग्राम में विजयी बनाती है। तभी हमें ज्ञान प्राप्त होता है।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु की उपासना हमें मन व इन्द्रियसमूह का अधिष्ठाता बनाए। ऐसा बनकर हम ज्ञानी बनें।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

क्षितयो भरेषु यमेनं राजानं वस्त्रमथिं तायुं नाऽनु क्रोशन्ति जसुरिं श्येनं न नीचायमानं पशुमच्छ्रवश्चाऽच्छ यूथञ्चाऽनु क्रोशन्त्युत स स्म सद्यो विनश्यति ॥५॥

Word-Meaning: - (उत) (स्म) (एनम्) (वस्त्रमथिम्) यो वस्त्राणि मथ्नाति तम् (न) इव (तायुम्) तस्करम् (अनु) (क्रोशन्ति) रुदन्ति (क्षितयः) मनुष्याः (भरेषु) सङ्ग्रामेषु (नीचा) नीचानि कर्म्माणि (अयमानम्) प्राप्नुवन्तम् (जसुरिम्) प्रयतमानम् (न) इव (श्येनम्) पक्षिविशेषम् (श्रवः) अन्नं श्रवणं वा (च) (अच्छ) अत्र संहितायामिति दीर्घः। (पशुमत्) पशवो विद्यन्ते यस्मिंस्तत् (च) (यूथम्) समूहम् ॥५॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः । यो राजा प्रजापालनेन विना करं हरति यस्य प्रजाभ्यो दुष्टा दुःखं ददति यः स्वयं नीचकर्मा श्येनवद्धिंस्रः पशुवन्मूर्खो यस्य सेना च चोरवद्वर्त्तते तस्य सद्यो विनाशो भवतीति निश्चयः ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Just as people cry out for help when a thief attacks their cloth and hearth and home, so do people call out to the fighter warrior in battles for the safety of their hearth and home and herds of cattle wealth when they see the terrible enemy descending like a hawk intending to attack.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The duties and attributes of a king are narrated.

Anvay:

That king is soon ruined whom men curse as a thief stealing the garment or acting meanly like a hawk. The people cry on account of his cruel treatment towards good animals. The people lose all respect of him owing to his mean behavior.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - You should know it for certain that the king is ruined within no time, who takes revenues from the people without fulfilling his duties properly, whose subjects are troubled by the wicked persons. Who himself is mean and violent like a hawk and stupid and whose army is like a thief.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जो राजा प्रजापालन न करता कर घेतो, ज्याच्या प्रजेला दुष्ट लोक त्रास देतात व जो स्वतः नीच कर्म करणारा असतो, श्येन पक्ष्याप्रमाणे हिंसक असून पशूप्रमाणे मूर्ख असतो. ज्याची सेना चोराप्रमाणे असते त्याचा तात्काळ विनाश होतो हे निश्चित. ॥ ५ ॥