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क॒नी॒न॒केव॑ विद्र॒धे नवे॑ द्रुप॒दे अ॑र्भ॒के। ब॒भ्रू यामे॑षु शोभेते ॥२३॥

English Transliteration

kanīnakeva vidradhe nave drupade arbhake | babhrū yāmeṣu śobhete ||

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Pad Path

क॒नी॒न॒काऽइ॑व। वि॒द्र॒धे। नवे॑। द्रु॒ऽप॒दे। अ॒र्भ॒के। ब॒भ्रू इति॑। यामे॑षु। शो॒भे॒ते॒ इति॑ ॥२३॥

Rigveda » Mandal:4» Sukta:32» Mantra:23 | Ashtak:3» Adhyay:6» Varga:30» Mantra:7 | Mandal:4» Anuvak:3» Mantra:23


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे विद्वानो ! आप जो (बभ्रू) अध्यापक और उपदेशक (यामेषु) प्रहरों में (कनीनकेव) सुन्दर के तुल्य (नवे) नवीन (विद्रधे) विशेष दृढ़ (द्रुपदे) शीघ्र प्राप्त होने योग्य पदार्थ वा वृक्ष आदि द्रव्यों के स्थान और (अर्भके) छोटे बालक के निमित्त (शोभेते) शोभित होते हैं, उनके सदृश संसार के उपकार करनेवाले होने को योग्य हों ॥२३॥
Connotation: - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो विद्वान् अधिक वा न्यून विज्ञान में वा काम में सुशोभित हों, वे जगत् के बीच कल्याण करनेवाले हों ॥२३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

इन्द्रियाश्व ?

Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्रियाश्व यामेषु) = जीवनयात्रा के मार्गों में गति करते हुए (शोभेते) = अत्यन्त ही शोभावाले होते हैं। ये (कनीनका इव) = [कन दीप्तौ] अत्यन्त ही दीप्तिवाले से हैं- चमकते (विद्रधे) = अत्यन्त दृढ़ हैं। (नवे) = [नु स्तुतौ] प्रशंसनीय हैं। (द्रुपदे) = गतिमय पाँवोंवाले हैं-अत्यन्त क्रियाशील हैं। (अर्भके) = ये [like, similar] सर्वत्र समान हैं। पशुओं में व मनुष्यों में इन इन्द्रियों का अन्तर नहीं हैं। मन व बुद्धि के कारण ही सारा अन्तर पड़ता है। (बभ्रू) = ये हमारा भरण करनेवाले हैं। कर्मेन्द्रियाँ सब कर्मों को तथा ज्ञानेन्द्रियाँ सब ज्ञानों को सिद्ध करती हुई हमारा भरण करती हैं । [२] इन्द्रियाश्व दीप्त तो हैं ही अपने-अपने कार्य को करने में अद्भुत इनकी क्षमता है। ये दृढ़ हैं - थोड़े से विरोध से विकृत होनेवाले नहीं । अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, सदा गतिशील हैं। सब प्राणियों में समानरूप से हैं। हमारा भरण इन्हीं के द्वारा होता है।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु ने इन्द्रियाश्वों की रचना अद्भुत ही की है।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

हे विद्वांसौ ! भवन्तौ यौ बभ्रू यामेषु कनीनकेव नवे विद्रधे द्रुपदे अर्भके शोभेते ताविव जगदुपकारकौ भवितुमर्हतः ॥२३॥

Word-Meaning: - (कनीनकेव) कमनीयेव (विद्रधे) विशेषेण दृढे (नवे) नवीने (द्रुपदे) सद्यः प्रापणीये वृक्षादिद्रव्यपदे वा (अर्भके) अल्पे (बभ्रू) अध्यापकोपदेशकौ (यामेषु) प्रहरेषु (शोभेते) ॥२३॥
Connotation: - अत्रोपमालङ्कारः । ये विद्वांसोऽधिकेऽल्पे विज्ञाने कर्मणि वा सुशोभिताः स्युस्ते जगति कल्याणकाराः स्युः ॥२३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Like the two pupils of the eyes, overly strong and lasting, ever new, ever cherished and subtle divine harbingers of the truth, goodness and beauty of existence, let nature’s complementaries ever shine blissfully in the hours of human yajna.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The theme of teacher and preacher is further developed in the mantra.

Anvay:

O teacher and preacher! all the time you shine like new and handsome substances like in the plants and babes. Both of these look fresh and exceptionally strong. Let us become benefactor like them.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Here is simile. The learned persons who distinguish in knowledge, let them become benefactor of the entire world.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे विद्वान अधिक किंवा न्यून विज्ञानाने किंवा कार्य करण्यामुळे सुशोभित होतात ते जगाचे कल्याणकर्ते ठरतात. ॥ २३ ॥