Go To Mantra
Viewed 347 times

ऋ॒जि॒प्य ई॒मिन्द्रा॑वतो॒ न भु॒ज्युं श्ये॒नो ज॑भार बृह॒तो अधि॒ ष्णोः। अ॒न्तः प॑तत्पत॒त्र्य॑स्य प॒र्णमध॒ याम॑नि॒ प्रसि॑तस्य॒ तद्वेः ॥४॥

English Transliteration

ṛjipya īm indrāvato na bhujyuṁ śyeno jabhāra bṛhato adhi ṣṇoḥ | antaḥ patat patatry asya parṇam adha yāmani prasitasya tad veḥ ||

Mantra Audio
Pad Path

ऋ॒जि॒प्यः। ई॒म्। इन्द्र॑ऽवतः। न। भु॒ज्युम्। श्ये॒नः। ज॒भा॒र॒। बृ॒ह॒तः। अधि॑। स्नोः। अ॒न्तरिति॑। प॒त॒त्। प॒त॒त्रि। अ॒स्य॒। प॒र्णम्। अध॑। याम॑नि। प्रऽसि॑तस्य। तत्। वेरिति॒ वेः ॥४॥

Rigveda » Mandal:4» Sukta:27» Mantra:4 | Ashtak:3» Adhyay:6» Varga:16» Mantra:4 | Mandal:4» Anuvak:3» Mantra:4


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

Word-Meaning: - जो (ऋजिप्यः) सरल मार्ग चलनेवालों में श्रेष्ठ मनुष्य (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश (बृहतः) बड़े (स्नोः) प्रकाशमान पुरुषार्थ से (इन्द्रावतः) ऐश्वर्य्य से युक्तों को (न) जैसे वैसे (भुज्युम्) भोग करनेवाले को (अधि, जभार) अधिक धारण करता है (अस्य) इसका (पर्णम्) पत्र (यामनि) मार्ग में और (प्रसितस्य) बँधे हुए (वेः) पक्षी का जो (पतत्रि) गिरनेवाला पत्र (अन्तः) मध्य में (पतत्) गिरता है (तत्) उसको (जभार) धारण करता है वह (अध) इसके अनन्तर (ईम्) सब प्रकार से आनन्द को प्राप्त होवे ॥४॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे वाज पक्षी अपने पुरुषार्थ से बहुत भोग को प्राप्त होता और शीघ्र चलता है, वैसे ही पुरुषार्थ करनेवाले जन बहुत सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञानदीप्त अन्तर्वृत्ति मन

Word-Meaning: - [१] (ऋजिप्यः) = [ऋजु+प्या] ऋजुमार्ग से आगे बढ़नेवाला (श्येन:) = शंसनीय गतिवाला [पुरुष] (इन्द्रावतः) = जितेन्द्रिय पुरुष से रक्षण किये जाते हुए [इन्द्र अव] (बृहतः) = वृद्धि के कारणभूत (ष्णो:) = सुखवर्षक ज्ञान द्वारा (न भुज्युम्) = भोगों में न फँसे हुए शिष्य को (अधिजभार) = विषयों से ऊपर ले जाता है- उत्कृष्ट मार्ग की ओर ले जाता है। अत्यन्त विषयप्रवण वृत्तिवाले शिष्य को ज्ञान देना भी कठिन होता है। विद्यार्थी के लिए 'न भुज्यु' होना आवश्यक है। [२] अब ज्ञान प्राप्त करने पर (अस्य) = इसका (पतत्रि) = उड़नेवाला-निरन्तर इधर-उधर भटकनेवाला (पर्णम्) = पंख पालक मनरूप पंख, (अन्त:) = अन्दर पतत् गतिवाला होता है- अब इसका मन बाहर विषयों में नहीं भटकता। (अध) = अब (यामनि) = मार्ग में (प्रसितस्य) = बन्धे हुए निरन्तर मार्ग में चलते हुए इसका (तद्) = वह मनरूप (पर्ण वेः) = कान्तिमान् होता है [वी - कान्ति] । अब यह चमकते हुए जीवनवाला बन जाता है।
Connotation: - भावार्थ - ज्ञान द्वारा निर्मल मन अन्तर्मुखी वृत्तिवाला होता हुआ सदा मार्ग पर आगे बढ़ता है।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

Anvay:

य ऋजिप्यो मनुष्यः श्येन इव बृहतः स्नोरिन्द्रावतो न भुज्युमधि जभार। अस्य पर्णं यामनि प्रसितस्य वेर्यत् पतत्रि पर्णमन्तः पतत् तज्जभार सोऽधेमानन्दं प्राप्नुयात् ॥४॥

Word-Meaning: - (ऋजिप्यः) य ऋजुगामिषु साधुः (ईम्) सर्वतः (इन्द्रावतः) ऐश्वर्य्ययुक्तान् (न) इव (भुज्युम्) भोक्तारम् (श्येनः) श्येन इव (जभार) धरति (बृहतः) महतः (अधि) (स्नोः) प्रकाशमानात् पुरुषार्थात् (अन्तः) मध्ये (पतत्) पतति (पतत्रि) पतनशीलम् (अस्य) (पर्णम्) पत्रम् (अध) (यामनि) मार्गे (प्रसितस्य) बद्धस्य (तत्) (वेः) पक्षिणः ॥४॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! यथा श्येनः पक्षी स्वपुरुषार्थेन पुष्कलं भोगं प्राप्नोति सद्यो गच्छति तथैव पुरुषार्थिनो जनाः पुष्कलं सुखं प्राप्नुवन्ति ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The falcon bird of the spirit, going by the path of rectitude always under the protection of Indra, lord of life, bears the sacred vessel of the body like a prize from the vast regions of joy and energy and, at the end, flying up, the bird on the wing jettisons the sacred vessel like the plume of a bird bound down to the nest.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The subject of soul is extensively dealt.

Anvay:

That man who is good among the upright and who is active like a hawk, because of his great shining industriousness, supports a right person, who enjoys the fruit of action like prosperous person and attains much bliss. Like the falling wing of a tied bird, he upholds the law.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - O men ! as a hawk gets much enjoyment from its. labor and goes to distant places, in the same manner, industrious persons get abundant happiness.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो ! जसे श्येन पक्षी आपल्या पुरुषार्थाने पुष्कळ भोग प्राप्त करतो व वेगाने उडतो तसेच पुरुषार्थ करणारे लोक अत्यंत सुख प्राप्त करतात. ॥ ४ ॥