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मि॒त्राय॒ पञ्च॑ येमिरे॒ जना॑ अ॒भिष्टि॑शवसे। स दे॒वान्विश्वा॑न्बिभर्ति॥

English Transliteration

mitrāya pañca yemire janā abhiṣṭiśavase | sa devān viśvān bibharti ||

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Pad Path

मि॒त्राय। पञ्च॑। ये॒मि॒रे॒। जनाः॑। अ॒भिष्टि॑ऽशवसे। सः। दे॒वान्। विश्वा॑न्। बि॒भ॒र्ति॒॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:59» Mantra:8 | Ashtak:3» Adhyay:4» Varga:6» Mantra:3 | Mandal:3» Anuvak:5» Mantra:8


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! ये (पञ्च) पाँच प्राण आदि के सदृश (जनाः) विद्वान् लोग जिस (अभिष्टिशवसे) अपेक्षित बलयुक्त (मित्राय) मित्र के सदृश सबको सुख देनेवाले परमात्मा के लिये (येमिरे) यमादि साधन साधते हैं, (सः) वह (विश्वान्) समस्त (देवान्) सूर्य्य आदिकों को (बिभर्त्ति) धारण तथा पोषण करता है, ऐसा जानो ॥८॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रोके गये प्राणवायु इन्द्रियों को रोकते हैं, वैसे ही योगीजन समाधि से परमात्मा को प्राप्त होते हैं ॥८॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'अभिष्टिशवस्' सूर्य

Word-Meaning: - [१] 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र व निषाद' इन पाँच भागों में बटे हुए (पञ्चजनाः) = समाज के ये पाँचों जन (अभिष्टिशवसे) = [शत्रूणामभिगत्तृ- बलयुक्ताय सा०] रोगरूप शत्रुओं पर आक्रमण करनेवाले बल से युक्त मित्राय सूर्य के लिए (येमिरे) = हवियों को (उद्यत) = करते हैं [हवींषि उद्यच्छन्ति सा०], अर्थात् सूर्योदय होने पर पञ्चजन अग्निहोत्र करते हैं। यह अग्नि में डाली हुई आहुति सूर्य तक पहुँचती है। इस प्रकार सूर्य के लिए ये हवियाँ दी जाती हैं । 'उद्यन्नादित्यः क्रिमीन् हन्ति, निम्लोचन् हन्ति रश्मिभिः' = यह उदय होता हुआ सूर्य क्रिमियों को नष्ट करता है, अस्त होता हुआ भी रश्मियों से इन क्रिमियों को समाप्त करता है। इस प्रकार यह सूर्य 'अभिष्टिशवस्' है । [२] (सः) = वह रोगकृमियों को विनष्ट करनेवाला सूर्य (विश्वान् देवान्) = सब दिव्यगुणों को (बिभर्ति) = हमारे में धारण करता है। सूर्य हमें नीरोग बनाता है, हमारे में प्राणशक्ति के संचार का कार्य करता है। इस प्रकार पूर्ण स्वस्थ बने शरीर में यह स्वस्थ मन को उत्पन्न करता है। मन में आसुरभावों का विनाश होकर दिव्यभाव ही उपजते हैं ।
Connotation: - भावार्थ– सूर्योदय होने पर पञ्चजन अग्निहोत्र करते हैं। इस प्रकार रोगकृमियों का विनाश होता है और दिव्यगुणों का विकास ।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

हे मनुष्या इमे पञ्च प्राणा इव जना यस्मा अभिष्टिशवसे मित्राय येमिरे स विश्वान् देवान् बिभर्त्तीति विजानीत ॥८॥

Word-Meaning: - (मित्राय) सखेव सर्वेषां सुखप्रदाय (पञ्च) प्राणादयः (येमिरे) यच्छन्ति (जनाः) विद्वांसः (अभिष्टिशवसे) अभीष्टबलाय (सः) (देवान्) सूर्य्यादीन् (विश्वान्) सर्वान् (बिभर्त्ति) धरति पुष्णाति ॥८॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा निगृहीताः प्राणा इन्द्रियाणि निगृह्णन्ति तथैव योगिनो जना समाधिना परमात्मानं प्राप्नुवन्ति ॥८॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - All the five classes of people offer service and oblations to Mitra, radiant lord of love and friendship, who commands all desirable power and protection. That lord sustains all the brilliant and generous powers and forces of nature and humanity.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The greatness of God and His worthiness for worshipping is highlighted.

Anvay:

O men! you should know that in order to attain God, Who is very friendly to all, and giver of happiness that all persons practice Yoga with the five Pranas (vital breaths) and worship. It is He, Who is Almighty, Who upholds the Sun and other luminaries.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - With the Pranas controlled, the senses are under check. So the Yogis attain God through the Samadhi (absorption or perfect concentration).

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जसा निग्रह केलेला प्राण इंद्रियांना रोखतो तसेच योगी समाधीद्वारे परमेश्वराला प्राप्त करतात. ॥ ८ ॥