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यद॑न्त॒रा प॑रा॒वत॑मर्वा॒वतं॑ च हू॒यसे॑। इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि॥

English Transliteration

yad antarā parāvatam arvāvataṁ ca hūyase | indreha tata ā gahi ||

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Pad Path

यत्। अ॒न्त॒रा। प॒रा॒वत॑म्। अ॒र्वा॒वत॑म्। च॒। हू॒यसे॑। इन्द्र॑। इ॒ह। ततः॑। आ। ग॒हि॒॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:40» Mantra:9 | Ashtak:3» Adhyay:3» Varga:2» Mantra:4 | Mandal:3» Anuvak:4» Mantra:9


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

Word-Meaning: - हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के दाता ! आप (इह) इस राज्य में (यत्) जो (अन्तरा) व्यवधान अर्थात् मध्य में (परावतम्) दूर देश और (अर्वावतम्) समीप में वर्त्तमान को (च) और पुकारते हैं उन लोगों से (हूयसे) पुकारे जाते हो (ततः) इससे हम लोगों को (आ, गहि) प्राप्त हूजिये ॥९॥
Connotation: - राजा दूर देश में हो और प्रजा सेना और मन्त्री जन अन्यत्र भी वर्त्तमान हों तथापि दूतों के द्वारा सब लोगों के साथ में समीप वर्त्तमान हो सके ॥९॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चालीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

हृदय में प्रभु का आराधन

Word-Meaning: - [१] हे इन्द्र हमारे सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (यत्) = जब (परावतम्) = सुदूर देश द्युलोक (च) = व (अर्वावतम्) = समीप देश इस पृथिवीलोक के (अन्तरा) = बीच में, अर्थात् मस्तिष्करूप द्युलोक व शरीररूप पृथिवीलोक के मध्य में हृदयान्तरिक्ष में हूयसे आप पुकारे जाते हैं, तो (इह) = यहाँ हमें (ततः) - तब (आगहि) = अवश्य प्राप्त होइये । [२] हृदय में प्रभु का आराधन करते हुए हम उस प्रभु का दर्शन करनेवाले हों। वस्तुतः प्रभु का दर्शन यहाँ हृदय में ही होता है। हृदय देश में आत्मा व परमात्मा दोनों का ही वास है। इसीलिए यह सर्वोत्तम देश [परम परार्ध] कहलाता है।
Connotation: - भावार्थ- हृदय में प्रभु का आराधन करते हुए हम उस प्रभु का दर्शन करनेवाले बनें । सम्पूर्ण सूक्त उपासना को ही सोमरक्षण का साधन बताता है। इस रक्षित सोम से ही शक्ति व ज्ञान की वृद्धि को प्राप्त करके हम प्रभु का दर्शन करनेवाले बनते हैं। यही भाव अगले सूक्त में भी दर्शनीय है-

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

हे इन्द्र ! त्वमिह यद्यमन्तरा परावतमर्वावतं चाह्वयति तैश्च हूयसे ततोऽस्मानागहि ॥९॥

Word-Meaning: - (यत्) यः (अन्तरा) व्यवधाने (परावतम्) दूरदेशस्थम् (अर्वावतम्) प्राप्तसामीप्यम् (च) (हूयसे) स्तूयसे (इन्द्र) परमैश्वर्य्यप्रद (इह) अस्मिन् राज्ये (ततः) (आ) (गहि) आगच्छ ॥९॥
Connotation: - राजा दूरदेशे प्रजासेनाऽमात्यजनोऽन्यत्रापि वर्त्तेत तथापि भृत्यद्वारा सर्वैः सह समीपस्थो भवेदिति ॥९॥ अत्र राजप्रजागुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इति चत्वारिंशत्तमं सूक्तं द्वितीयो वर्गश्च समाप्तः ॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, lord giver of prosperity, invoked from within, from far and from near, come from there, anywhere, take us and bless us with grace.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The subject of attributes of the ruler along with his subject is stated.

Anvay:

O Indra you are giver of plenty of wealth. Invited from nigh, from the middle or from distance, you come and reach us.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - Whenever a king is in a far off country and his ministers and men of army are here, he should remain in touch with them through his personal staff servants and workers.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - राजा परदेशात असेल व प्रजा, सेना, मंत्री इतरत्र असतील तर (दूताद्वारे) सेवकाद्वारे सर्व लोकांशी संपर्क साधता येतो. ॥ ९ ॥