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अ॒भि द्यु॒म्नानि॑ व॒निन॒ इन्द्रं॑ सचन्ते॒ अक्षि॑ता। पी॒त्वी सोम॑स्य वावृधे॥

English Transliteration

abhi dyumnāni vanina indraṁ sacante akṣitā | pītvī somasya vāvṛdhe ||

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Pad Path

अ॒भि। द्यु॒म्नानि॑। व॒निनः॑। इन्द्र॑म्। स॒च॒न्ते॒। अक्षि॑ता। पी॒त्वी। सोम॑स्य। व॒वृ॒धे॒॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:40» Mantra:7 | Ashtak:3» Adhyay:3» Varga:2» Mantra:2 | Mandal:3» Anuvak:4» Mantra:7


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

Word-Meaning: - हे राजन् ! जैसे (वनिनः) माँगनेवाले जन (अक्षिता) नाश से रहित (द्युम्नानि) यशों के (अभि) सन्मुख (इन्द्र) ऐश्वर्य्य करनेवाले का (सचन्ते) सम्बन्ध होते हैं और जैसे मैं (सोमस्य) ओषधिरूप ऐश्वर्य्य के योग से (पीत्वी) पान करके (वावृधे) वृद्धि करूँ, वैसे आप करो ॥७॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को चाहिये कि धर्म्मयुक्त अत्यन्त पुरुषार्थ से नहीं नाश होने योग्य ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर नियमित भोजन औऱ विहार से आरोग्य को उत्पन्न करके संसार में उत्तम कीर्त्ति का विस्तार करैं ॥७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सोमरक्षण व सर्वाङ्गीण उन्नति

Word-Meaning: - [१] (वनिनः) = उस सम्भजनीय [उपासनीय] प्रभु के (द्युम्नानि) = द्योतमान, अर्थात् ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाले अक्षिता सब क्षयों से बचानेवाले ये सोमकण (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (अभिसचन्ते) = प्राप्त होते हैं। प्रभु इसलिए उपासना के योग्य हैं कि प्रभु हमें उन सोमकणों को प्राप्त कराते हैं, जो कि हमारे जीवनों को ज्योतिर्मय बनाते हैं और हमें सब प्रकार के विनाशों से बचाते हैं। [२] यह इन्द्र [जितेन्द्रिय पुरुष] (सोमस्य पीत्वी) = सोम का पान करके (वावृधे) = अत्यन्त ही वृद्धि को प्राप्त करता है। सोम उसकी सब प्रकार की उन्नतियों का मूल बनता है।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से मनुष्य सर्वांगीण उन्नति करनेवाला होता हैं।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

हे राजन् ! यथा वनिनोऽक्षिता द्युम्नान्यभीन्द्रं सचन्ते यथाऽहं सोमस्य पीत्वी वावृधे तथा त्वमाचर ॥७॥

Word-Meaning: - (अभि) आभिमुख्ये (द्युम्नानि) यशांसि जलान्यन्नानि धनानि वा (वनिनः) याच्ञावन्तः (इन्द्रम्) ऐश्वर्य्यकरम् (सचन्ते) सम्बध्नन्ति (अक्षिता) क्षयरहितानि (पीत्वी) (सोमस्य) ओषध्यैश्वर्य्यस्य योगेन (वावृधे) वर्धते ॥७॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। सर्वैर्मनुष्यैर्धर्मयुक्तेन परमपुरुषार्थेनाऽक्षयमैश्वर्यं प्राप्य युक्ताऽऽहारविहारेणाऽऽरोग्यं सम्पाद्य च जगति सुकीर्त्तिर्विस्तारणीया ॥७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Seekers and celebrants, serve Indra and pray for honour, excellence and prosperity of imperishable value, and as I drink of the soma of his grace, so he too waxes in divine joy as he accepts our homage.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The same subject of duties and merits of the ruler and people is stated.

Anvay:

O king ! let suppliants and beggars be united with the President (of the council of ministers) who possesses undecaying glory, food and wealth. He gives much wealth. As I grow in vigor by taking Soma (Juice of invigorating herbs) and acquire wealth, so you should also do.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - It is the duty of all men to gain good reputation in the world by acquiring undecaying wealth with righteous industriousness and by maintaining health through regular food and walk etc.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सर्व माणसांनी धर्मयुक्त पुरुषार्थाने शाश्वत ऐश्वर्य प्राप्त करावे. नियमित आहार विहाराने आरोग्य संपादन करावे आणि जगात उत्तम कीर्ती पसरवावी. ॥ ७ ॥