स॒मि॒ध्यमा॑नः प्रथ॒मानु॒ धर्मा॒ समु॒क्तभि॑रज्यते वि॒श्ववा॑रः। शो॒चिष्के॑शो घृ॒तनि॑र्णिक्पाव॒कः सु॑य॒ज्ञो अ॒ग्निर्य॒जथा॑य दे॒वान्॥
samidhyamānaḥ prathamānu dharmā sam aktubhir ajyate viśvavāraḥ | śociṣkeśo ghṛtanirṇik pāvakaḥ suyajño agnir yajathāya devān ||
स॒म्ऽइ॒ध्यमा॑नः। प्र॒थ॒मा। अनु॑। धर्म॑। सम्। अ॒क्तुऽभिः॑। अ॒ज्य॒ते॒। वि॒श्वऽवा॑रः। शो॒चिःऽके॑शः। घृ॒तऽनि॑र्निक्। पा॒व॒कः। सु॒ऽय॒ज्ञः। अ॒ग्निः। य॒जथा॑य। दे॒वान्॥
SWAMI DAYANAND SARSWATI
अब पाँच ऋचावाले सत्रहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के गुणों को कहते हैं।
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
[१] जैसे (यजथाय) = यज्ञ के लिये (समिध्यमानः) = प्रदीप्त अग्नि (प्रथमा धर्मा अनु) = विस्तृत, श्रेष्ठ, प्रसिद्ध धर्मों के अनुसार (अक्तुभिः) = घृतादि से (अञ्जते) = दीप्त किया जाता है। (विश्ववार:) = सबसे वरणीय (शोचिष्केशः) = किरणों से युक्त (घृतनिर्णिक्) = घृत से पवित्र (पावकः) = पवित्र करनेवाला (सुयज्ञ:) = उत्तम यज्ञ का साधन होकर (अग्नि देवान् यजथाय भवति) = जो अग्रणी प्रभु विद्वानों को ज्ञान देने में समर्थ होता है।
SWAMI DAYANAND SARSWATI
अथाग्निगुणानाह।
हे मनुष्या यः समिध्यमानो विश्ववारः शोचिष्केशो घृतनिर्णिक् पावकः सुयज्ञोऽग्निः समक्तुभिर्यजथाय प्रथमा धर्माज्यते देवाननुगमयति तं संप्रयुङ्ग्ध्वम् ॥१॥
DR. TULSI RAM
ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA
The attributes of Agni (fire) are told.
O men! you should utilize that Agni (fire) for accomplishing various purposes which when kindled well at two junctions of day and night manifest divine attributes. This Agni is universally accepted as useful and its flames are like its hairs which feed and purify all by clarified butter. This ghee or butter is purifier, by which many good Yajnas (non-violent sacrifices) and benevolent acts are performed and is used for unifying, various activities and for performing definite religious rites.
MATA SAVITA JOSHI
या सूक्तात अग्नी व विद्वान यांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची मागच्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
