Go To Mantra
Viewed 404 times

अ॒ग्निं व॑र्धन्तु नो॒ गिरो॒ यतो॒ जाय॑त उ॒क्थ्यः॑। म॒हे वाजा॑य॒ द्रवि॑णाय दर्श॒तः॥

English Transliteration

agniṁ vardhantu no giro yato jāyata ukthyaḥ | mahe vājāya draviṇāya darśataḥ ||

Mantra Audio
Pad Path

अ॒ग्निम्। व॒र्ध॒न्तु॒। नः॒। गिरः॑। यतः॑। जाय॑ते। उ॒क्थ्यः॑। म॒हे। वाजा॑य। द्रवि॑णाय। द॒र्श॒तः॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:10» Mantra:6 | Ashtak:3» Adhyay:1» Varga:8» Mantra:1 | Mandal:3» Anuvak:1» Mantra:6


SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

Word-Meaning: - हे विद्वज्जनो ! आप लोग जैसे समिधों से (अग्निम्) अग्नि बढ़ता है वैसे (नः) हम लोगों की (गिरः) उत्तम प्रकार से शिक्षित वाणियों को (वर्धन्तु) वृद्धि करें (यतः) जिससे (महे) श्रेष्ठ (वाजाय) विज्ञान और (द्रविणाय) ऐश्वर्य के लिये (दर्शतः) देखने और (उक्थ्यः) प्रशंसा करने योग्य विद्वान् पुरुष (जायते) प्रकट होता है ॥६॥
Connotation: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। अध्यापक और उपदेशक पुरुषों को ऐसा प्रयत्न करना चाहिये जिससे कि पढ़ने और सुननेवाले जनों की उत्तम शिक्षा, विद्या और सभ्यता बढ़े और वे धनवान् होवें ॥६॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु का साक्षात्कार

Word-Meaning: - [१] (नः गिरः) = हमारी स्तुतिवाणियाँ (अग्निं वर्धन्तु) = उस अग्रणी प्रभु का ही वर्धन करें। (यतः) जिन स्तुतिवचनों से (उक्थ्यः) = वह प्रशंसनीय प्रभु जायते प्रादुर्भूत होता है। इन स्तुतिवचनों द्वारा प्रभु की महिमा प्रकट होती है। स्तोता सर्वत्र प्रभु की महिमा देखने लगता है। [२] ये प्रभु (महे वाजाय) = महान् वाज [शक्ति] के लिए होते हैं। स्तोता को वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे कि वह पर्वत के समान कष्टों को भी अनायास उठाने में समर्थ हो जाता है। ये प्रभु (महे द्रविणाय) = महान् ज्ञानरूप धन के लिए होते हैं, प्रभुस्तवन से अन्तर्ज्ञान प्राप्त होता है, वास्तविक ज्ञान तो यही है । ये प्रभु (दर्शतः) = दर्शनीय हैं। शक्ति व ज्ञान प्राप्त करके यह उपासक प्रभु का साक्षात्कार करता है।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु का ही स्तवन करें। इस स्तवन से ही प्रभु की महिमा दिखेगी। शक्ति व ज्ञान प्राप्त करके हम प्रभु का साक्षात्कार कर पाएँगे।

SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

हे विद्वांसो भवन्तः समिद्भिरग्निमिव नो गिरो वर्द्धन्तु यतो महे वाजाय द्रविणाय दर्शत उक्थ्यो जायते ॥६॥

Word-Meaning: - (अग्निम्) पावकमिव (वर्धन्तु) वर्द्धयन्तु। अत्र व्यत्ययेन परस्मैपदं णिजर्थोऽन्तर्गतः। (नः) अस्माकम् (गिरः) सुशिक्षिता वाचः (यतः) (जायते) (उक्थ्यः) प्रशंसितो योग्यो विद्वान् (महे) महते (वाजाय) विज्ञानाय (द्रविणाय) ऐश्वर्य्याय (दर्शतः) द्रष्टुं योग्यः ॥६॥
Connotation: - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। अध्यापकोपदेशकैस्तथा प्रयत्नो विधेयो यथाऽध्येतॄणां श्रोतॄणाञ्च सुशिक्षाविद्यासभ्यता वर्धेरन् श्रीमन्तश्च स्युः ॥६॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - For the sake of great energy and wealth of life, let our voices rise, and exalt and celebrate Agni, lord of light and omniscience, blissful vision of Eternity, whence arises the sagely scholar, admirable gift of Agni’s, whose very sight is holy and auspicious for the attainment of strength and real wealth of life.

ACHARYA DHARMA DEVA VIDYA MARTANDA

The duties of the teachers and preachers are elaborated.

Anvay:

O learned persons ! refurbish the power of our refined and cultured words of the mantra, as they multiply the fire with fuel or sacrificial sticks (SAMIDHA), so that a man (to whom those words are addressed ) may bear the great knowledge and wealth and may become praiseworthy and spectacular.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - The teachers and preachers should endeavor in such a manner that good education, wisdom and civilization of the pupils and audience may grow more and more and they may become wealthy.

MATA SAVITA JOSHI

N/A

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. अध्यापक व उपदेशकांनी असा प्रयत्न केला पाहिजे, की विद्यार्थी व श्रोते यांच्यामध्ये सुशिक्षण, विद्या व सभ्यता वाढावी आणि ते श्रीमंत व्हावेत. ॥ ६ ॥