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स वाजं॒ याताप॑दुष्पदा॒ यन्त्स्व॑र्षाता॒ परि॑ षदत्सनि॒ष्यन् । अ॒न॒र्वा यच्छ॒तदु॑रस्य॒ वेदो॒ घ्नञ्छि॒श्नदे॑वाँ अ॒भि वर्प॑सा॒ भूत् ॥

English Transliteration

sa vājaṁ yātāpaduṣpadā yan svarṣātā pari ṣadat saniṣyan | anarvā yac chatadurasya vedo ghnañ chiśnadevām̐ abhi varpasā bhūt ||

Pad Path

सः । वाज॑म् । याता॑ । अप॑दुःऽपदा । यन् । स्वः॑ऽसाता । परि॑ । स॒द॒त् । स॒नि॒ष्यन् । अ॒न॒र्वा । यत् । श॒तऽदु॑रस्य । वेदः॑ । घ्नन् । शि॒श्नऽदे॑वान् । अ॒भि । वर्प॑सा । भूत् ॥ १०.९९.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:99» Mantra:3 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:14» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:8» Mantra:3


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सः) वह (वाजम्) अमृतान्नभोग को (याता) प्राप्त करानेवाला (अपदुष्पदा यन्) यथार्थ ज्ञानस्वरूप पाद से-प्रापण शक्ति से सब जगत् के प्रति जाता हुआ-पहुँचता हुआ (स्वर्षाता) सुख का विभाजक (सनिष्यन्) कर्मफलों को भोग कराता हुआ (परिषदत्) सब ओर प्राप्त होता है (अनर्वा) अनाश्रित-स्वाधार (यत्) जिस (शतदुरस्य) बहुदोष छिद्रोंवाले के (वेदः) वेदनीय-धन को सर्वस्व को (घ्नन्) नष्ट करता हुआ (शिश्नदेवान्) गुप्तेन्द्रिय से खेलनेवाले व्यभिचारी जनों को-दुराचारियों को (वर्पसा-अभिभूत्) स्वरूप से-स्वात्मबल से अभिभूत करता है-दण्डित करता है ॥३॥
Connotation: - परमात्मा उपासक को अमृतान्नभोग कराता है, दुष्टों के धन का हरण करता है, व्यभिचारियों चरित्रहीनों को दण्ड देता है, इस प्रकार कर्मफलों को भुगाता है, सारे संसार में व्यापक होकर स्वाधार वर्त्तमान है ॥३॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सन्मार्ग का आक्रमण

Word-Meaning: - [१] (सः) = वह गत मन्त्र का उपासक (अप-दुष्पदा) = दुष्टाचार से रहित [अप] पुण्यमार्ग से (यन्) = गति करता हुआ (वाजं याता) = शक्ति को प्राप्त करता है । स्वर्षाता प्रकाश की प्राप्ति के निमित्त (सनिष्यन्) = संभजन करता हुआ (परिषदत्) = आसीन होता है। यह प्रभु-भजन उसके हृदय को प्रकाश प्राप्त कराता है । [२] (अनर्वा) = वासनाओं से हिंसित न होता हुआ (यत्) = जब यह (शतदुरस्य) = सैंकड़ों द्वारोंवाले इस असुर सम्राट् 'वृत्र' के (वेदः) = धन व ऐश्वर्य को (घ्नन्) = नष्ट करता है तो (शिश्नदेवान्) = अ-ब्रह्मचर्य से चलनेवालों को (वर्पसा अभिभूत्) = [आवरकेण बलेन] अभिभूत कर लेनेवाले बल से पराजित करता है । जितेन्द्रिय अजितेन्द्रियों को पराजित करनेवाला होता है ।
Connotation: - भावार्थ - सन्मार्ग से चलते हुए हम शक्तिशाली बनें ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सः-वाजं याता) सोऽमृतान्नभोगं प्रापयिता “अमृतोऽन्नं वै वाजः” [जै० ३।१९२] (अपदुष्पदा यन्) यथार्थज्ञानस्वरूपेण पादेन सर्वं जगत्प्रति गच्छन् सन् (स्वर्षाता) सुखस्य विभाजकः “स्वर्षाता सुखानां विभाजकः” [ऋ० ६।१७।८ दयानन्दः] (सनिष्यन्) कर्मफलानि सम्भाजयन् (परि सदत्) परिषीदति परितः प्राप्नोति (अनर्वा) अनाश्रितः (यत्) खलु (शतदुरस्य वेदः-घ्नन्) बहुदोषछिद्रस्य वेदनीयं-धनं सर्वस्वं नाशयन् (शिश्नदेवान्-वर्पसा-अभिभूत्) शिश्नेन उपस्थेन्द्रियेण ये दीप्यन्ति-क्रीडन्ति तान्-व्यभिचारिणश्दुश्चरितान्, “शिश्नदेवा अब्रह्मचर्या” [निरु० ४।२०] स्वरूपेण स्वात्मबलेनाभि-भवति ॥३॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - He goes on with the dynamics of existence by straight unfailing paths of law and rectitude, giving showers of joy, presiding over it all, keen to share it with one and all, irresistible and unhurting, opening a hundred doors of possibility for wealth and excellence, and subduing the demons of lust and impiety with force, the one supreme ruling power.