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आ त्वा॑ ह॒र्यन्तं॑ प्र॒युजो॒ जना॑नां॒ रथे॑ वहन्तु॒ हरि॑शिप्रमिन्द्र । पिबा॒ यथा॒ प्रति॑भृतस्य॒ मध्वो॒ हर्य॑न्य॒ज्ञं स॑ध॒मादे॒ दशो॑णिम् ॥

English Transliteration

ā tvā haryantam prayujo janānāṁ rathe vahantu hariśipram indra | pibā yathā pratibhṛtasya madhvo haryan yajñaṁ sadhamāde daśoṇim ||

Pad Path

आ । त्वा॒ । ह॒र्यन्त॑म् । प्र॒ऽयुजः॑ । जना॑नाम् । रथे॑ । व॒ह॒न्तु॒ । हरि॑ऽशिप्रम् । इ॒न्द्र॒ । पिब॑ । यथा॑ । प्रति॑ऽभृतस्य । मध्वः॑ । हर्य॑न् । य॒ज्ञम् । स॒ध॒ऽमादे॑ । दश॑ऽओणिम् ॥ १०.९६.१२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:96» Mantra:12 | Ashtak:8» Adhyay:5» Varga:7» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:8» Mantra:12


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (त्वा) तुझ (हर्यन्तम्) उपासनारस को चाहनेवाले-दुःखहरण गतिवाले को (हरिशिप्रम्) उपासक जनों के प्राणायामादि प्रबल योगाभ्यास प्रयोग (रथे) रमण स्थान हृदय में (आ वहन्तु) सम्य्क् रूप से प्राप्त करावें-ले आवें (प्रतिभृतस्य) समर्पित (मध्वः) उपासनामधु के रस को (यथा पिब) यथेष्ट पान कर (सधमादे) सहस्थान हृदय में (दशोणिं यज्ञम्) दशेन्द्रियों के विषयों से ऊन-रिक्त या रहित-निर्विषयक अध्यात्मज्ञ को (हर्यन्) चाहता हुआ हमारे अन्दर विराजमान रह ॥१२॥
Connotation: - परमात्मा प्राणायामादि योगाभ्यासों के सेवन से तथा इन्द्रियों के विषय से रहित ध्यान द्वारा हृदय में साक्षात् होता है, उपासक के समस्त दुःखों एवं दोषों को दूर कर देता है ॥१२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दशोणि यज्ञ का स्वीकार

Word-Meaning: - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (हरिशिप्रम्) = हरणशील हैं हनू व नासिका जिसकी जबड़े तो भोजन का खूब चर्वण करके रोगों को दूर करनेवाले हैं तथा नासिका प्राणायाम के द्वारा वासनाओं को विनष्ट करनेवाली है । इस प्रकार ये हनू व नासिका दोनों ही 'हरि' हैं । (त्वा) = इस तुझ हरिशिप्र को, (हर्यन्तम्) = प्रभु प्राप्ति की कामनावाले को (जनानाम्) = लोगों की (प्रयुजः) = प्रकृष्ट योगवृत्तियाँ (रथे) = इस शरीर रथ पर (आवहन्तु) = धारण करनेवाली हों। इन प्रयुजों से ही तू प्रभु को प्राप्त करनेवाला बनेगा। [२] इन योगवृत्तियों को तू अवश्य धारण कर, (यथा) = जिससे तू (प्रतिभृतस्य) = प्रतिदिन तेरे में पोषित होनेवाले (मध्वः) = सोम का, सब भोजनों के सारभूत मधुतुल्य सोम का (पिबा) = पान करनेवाला हो । [३] तू (सधमादे) = प्रभु प्राप्ति के द्वारा प्रभु के साथ [सह] मिलकर आनन्द अनुभव करने के निमित्त (दशोणिम्) = [ओणि = protection] दसों इन्द्रियों की रक्षा करनेवाले अथवा [ओणि=removing] दसों इन्द्रियों को विषयों से अपनीत करनेवाले (यज्ञम्) = श्रेष्ठतम कर्म की (हर्यन्) = कामना करनेवाला हो, श्रेष्ठतम कर्म की ओर तू चलनेवाला हो। [हर्य गतिकान्त्योः] ।
Connotation: - भावार्थ- मनुष्य योगवृत्तिवाला बने, सोम का धारण करे, प्रभु प्राप्ति के आनन्द के लिए दसों इन्द्रियों के रक्षक यज्ञ को करनेवाला हो, अर्थात् सदा उत्तम कर्मों में लगा ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (त्वा हर्यन्तं हरि-शिप्रम्) त्वामुपासनारसं कामयमानं दुःखहरणगतिकम् (जनानां प्रयुजः) उपासकजनानां प्रयोगाः प्रबलयोगाभ्यासाः प्राणायामादयः (रथे-आ वहन्तु) रमणस्थाने हृदये-आनयन्तु (प्रतिभृतस्य मध्वः-यथा पिब) समर्पितस्य खलूपासनामधुनो रसं यथेष्टं पानं कुरु (सधमादे) सहस्थाने तत्रैव सहस्थाने हृदये (दशोणिं यज्ञं हर्यन्) दशेन्द्रियविषयरहितम् “दशोणिम्-दशधोणि परिहाणं यस्य तम्” [ऋ० ६।२०।८ दयानन्दः] अध्यात्मयज्ञं कामयमानाः सन् ॥१२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, may the radiations of your light bear and bring you, glorious lord of golden visor, by your cosmic chariot to the people so that you, loving the yajna, drink of the honey sweet soma extracted and prepared with utmost dexterity of hand and care in the hall of yajna.