ग्नाः - नद्यः - स्वगूर्ता:
Word-Meaning: - [१] उर्वशी कहती हैं कि हे (पुरुरवः) = प्रभु का स्तवन करनेवाले पतिदेव ! (यत्) = जब (त्वा) = आपको (देवाः) = सब देव (महे रणाय) = महत्त्वपूर्ण इस अध्यात्म संग्राम के लिए, काम-क्रोधादि से चलनेवाले संग्राम के लिए (अवर्धयन्) = बढ़ाते हैं और (दस्युहत्याय) = दास्यव वृत्तियों के नाश के लिए समर्थ करते हैं तो उस समय इस प्रकार (अस्मिन्) = इस पति के (संजायमाने) = सम्यक् विकास- वाला होने पर (आसत) = पत्नियाँ भी ठीक से घर में बैठती हैं, अर्थात् घर में स्थिर होकर रहती हैं। पति के क्रोधादि के वशीभूत होने पर पत्नी का घर पर रहना कुछ कठिन-सा हो जाता है । [२] इस प्रकार शान्त वातावरण में रहती हुई ये पत्नियाँ (ग्नाः) = देवपत्नियाँ होती हैं, इनका ज्ञान प्राप्ति की ओर झुकाव होता है व्यर्थ की गपशप में न पड़कर ये खाली समय को स्वाध्याय में बिताती हैं । यह स्वाध्याय उनमें दिव्यता की वृद्धि का कारण बनता है। पति देव बनेगा, तो पत्नी देवपत्नी होगी ही । (उत) = और इस प्रकार की पत्नियाँ (ईम्) = निश्चय से (अवर्धन्) = पति की भी वृद्धि का कारण बनती हैं। (नद्यः) = [नदिः=स्तोता] ये प्रभु स्तवन की वृत्तिवाली होती हैं और (स्वगूर्ता:) = अपने कार्यों में उद्यमनवाली बनती हैं, अपने सब कार्यों को श्रम से करती हुई उन कार्यों में ही आनन्द का अनुभव लेती हैं।
Connotation: - भावार्थ-पति क्रोधी न हों तो पत्नी 'स्वाध्यायशील स्तवन की वृत्तिवाली व स्वकर्मनिपुण' बनती है। इससे घर सुन्दर बनता है, वह बढ़ता चलता है।