Word-Meaning: - [१] पत्नी उत्तर देती हुई कहती है कि (तव एता वाचा) = आपकी इस घर के प्रबन्ध के विषय की बातों से (अहं किं कृणवा) = मैं क्या करूँगी ? मैं अनपढ़ थोड़े ही हूँ ? ऋतु के अनुसार भोजनादि की व्यवस्था को मैं स्वयं समझती हूँ । (उषसाम्) = उषाकालों के भी (अग्रिया इव) = आगे चलनेवाली-सी मैं (प्राक्रमिषम्) = प्रकृष्ट पुरुषार्थ में लग जाती हूँ । बातों का मुझे अवकाश भी कहाँ है ? [२] (पुरुरवः) = खूब ही प्रभु का स्मरण करनेवाले आप घर के बाहर की व्यवस्था को सम्भालनेवाले होइये। घर के संचालन के लिए धनार्जन आपने करना है, सो घर पर बैठकर क्या भोजन बनाना है और क्या नहीं ऐसी बातों आपको शोभा भी तो नहीं देती। हाँ, अपना कार्य करने के बाद (पुनः) = फिर (अस्तं परेहि) = घर में आप वापिस आनेवाले होइये । वहाँ से इधर-उधर क्लब आदि में जाने का कार्यक्रम न रखिये । [३] अपनी अनुपस्थिति में मेरी रक्षा की भी आपने चिन्ता नहीं करनी । (अहम्) = मैं तो (वात इव) = वायु की तरह (दुरापना अस्मि) = किसी भी अशुभाचरण पुरुष से कठिनता से प्राप्त करने योग्य हूँ । कोई भी मेरा धर्षण नहीं कर सकता। मैं नाजुक न होकर 'उताहमस्मि संजया'= वीर हूँ, सदा जीतनेवाली हूँ। मैं अपनी रक्षा ठीक से कर सकूँगी। इधर से निश्चिन्त होकर आपने अपना कार्य ठीक से करनेवाला बनना ।
Connotation: - भावार्थ- पत्नी प्रातः से ही घर के कार्यों में व्यस्त हो जाए। वह गृहकार्यों के लिए इतनी समझ रखती हो कि पति को कुछ कहने की आवश्यकता न हो। वह वीर हो स्वयं अपनी रक्षा कर सके। पति अवकाश मिलते ही घर पर आएँ, क्लब आदि में मनोरञ्जन को न ढूँढ़ें।