पुरुरवा की शपथें [ नारी का समादर ]
Word-Meaning: - [१] उर्वशी की गत मन्त्रोक्त अन्तिम बात को सुनकर पुरुरवा शपथ खाकर अपनी निर्दोषता को प्रमाणित करता है। उसका अभिप्राय यह है कि व्यर्थ में कुछ भ्रान्ति [ गलतफहमी ] हो गई है। वास्तव में कोई ऐसी बात ही नहीं। वह कहता है कि यदि मैंने तुम्हारी बातों पर जानबूझकर ध्यान न दिया हो तो (अद्य) = आज (सुदेवः) = तुम्हारे साथ उत्तम क्रीड़ा करनेवाला भी (अनावृत्) = आवरण से रहित हुआ हुआ, सिर छुपाने के स्थानभूत गृह से रहित हुआ हुआ (प्रपतेत्) = भटकनेवाला है। मेरे भाग्य में भटकना ही भटकना लिखा हो । [२] (उ) = और (परमां परावतं गन्तवा) = [दूरादपि दूरदेशं गन्तुं - महाप्रस्थानयात्रां कर्तुं ] वह व्यक्ति दूर से दूर देश में जानेवाला हो अर्थात् महाप्रस्थान यात्रा को करनेवाला बने । [३] (अधा) = अब यह व्यक्ति (निरृतेः उपस्थे) = दुर्गति की गोद में (शयीत) = सोनेवाला हो । अधिक से अधिक दुर्गति को प्राप्त हो । [४] (अध) = और (एनम्) = इसे (रभसास:) = बड़े जबर्दस्त, खूँखार (वृका:) = भेड़िये (अद्युः) = खा जाएँ । जानबूझकर तुम्हारा यदि मैंने अपमान किया हो तो मुझे भूखे भेड़िये अपना भोजन बना डालें। इस प्रकार शपथपूर्वक अपनी निर्दोषता को कहता हुआ पुरुरवा उर्वशी को अनुनीत करना चाहता है ।
Connotation: - भावार्थ- पत्नी का तिरस्कार करनेवाला [क] भटकता है, [ख] मृत्यु को प्राप्त होता है, [ग] दुर्गति को भोगता है, [घ] भूखे भेड़ियों का भोजन बनता है ।