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प्र तद्दु॒:शीमे॒ पृथ॑वाने वे॒ने प्र रा॒मे वो॑च॒मसु॑रे म॒घव॑त्सु । ये यु॒क्त्वाय॒ पञ्च॑ श॒तास्म॒यु प॒था वि॒श्राव्ये॑षाम् ॥

English Transliteration

pra tad duḥśīme pṛthavāne vene pra rāme vocam asure maghavatsu | ye yuktvāya pañca śatāsmayu pathā viśrāvy eṣām ||

Pad Path

प्र । तत् । दुः॒ऽशीमे॑ । पृथ॑वाने । वे॒ने । प्र । रा॒मे । वो॒च॒म् । असु॑रे । म॒घव॑त्ऽसु । ये । यु॒क्त्वाय॑ । पञ्च॑ । श॒ता । अ॒स्म॒ऽयु । प॒था । वि॒ऽश्रावि॑ । ए॒षा॒म् ॥ १०.९३.१४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:93» Mantra:14 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:28» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:8» Mantra:14


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ये-अस्मयु) जो हमें चाहनेवाले हितैषी विद्वान् (पञ्चशता) पाँच सौ गुणित शक्तिवाली इन्द्रियों को (युक्त्वाय) योजित करके (पथा) ज्ञानमार्ग से-ज्ञानप्रदान क्रम से (विश्रावि) विशेषरूप से सुनाने योग्य परमात्मज्ञान है (एषाम्) इनके अर्थ (तत्) उस सुनाए हुए (दुःशीमे) जहाँ दुःख से सोते हैं, ऐसे (पृथवाने) विस्तृत (वेने) कामनापूर्ण (राये) भोग में रमे हुए जनसमुदाय में (मघवत्सु) धनवान् जनों में (प्रवोचम्) प्रवचन करूँ ॥१४॥
Connotation: - जिन हितैषी विद्वानों द्वारा ज्ञानप्रदान क्रम से हमारे मन आदि को पाँच सौ गुणित शक्तिवाले बना करके परमात्मज्ञान प्रदान करते हैं, उसका विशेषरूप से विषयों में रत हुए दुःख से सोनेवाले जनसमुदाय में तथा धन के लोलुप जनों में उपदेश करना चाहिये ॥१४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'दुःशीम- पृथवान - वने - राम- असुर- मघवान्'

Word-Meaning: - [१] प्रभु कहते हैं कि (तद्) = उस गतमन्त्र के (हिरण्य) = हितरमणीय ज्ञान को (दुःशीमे) = सब बुराइयों को शान्त करनेवाले में, सब वासनाओं को जीतनेवाले में पृथवाने वासनाओं को जीतकर शक्तियों का विस्तार करनेवाले में और इस प्रकार (वेने) = अपने जीवन को कान्त व सुन्दर बनानेवाले में (प्रवोचम्) = कहता हूँ। [२] इस ज्ञान का मैं रामे भक्ति में रमण करनेवाले में अथवा संसार की सब क्रियाओं को एक क्रीड़क की मनोवृत्ति से करनेवाले में [रम् क्रीडायाम्], (असुरे) = प्राणशक्ति में रमण करनेवाले में [असुषु रमते] = प्राणायामादि द्वारा प्राणशक्ति को बढ़ानेवाले में तथा (मघवत्सु) = [मघ- ऐश्वर्य तथा यज्ञ 'मख'] ऐश्वर्यशाली तथा अपने ऐश्वर्य का यज्ञों में विनियोग करनेवालों में (प्र अवोचम्) = प्रवचन करता हूँ। [३] इस ज्ञान को प्राप्त करके इस ज्ञान के अनुसार (ये) = जो (पञ्च) = पाँचों प्राणों, पाँचों कर्मेन्द्रियों, पाँचों ज्ञानेन्द्रियों व अन्तःकरण पंचक को [मन-बुद्धि-चित्त- अहंकार - हृदय] (शता) = सौ के सौ वर्ष तक युक्त्वाय शरीररूप रथ में ठीक प्रकार से जोतकर (पथा) = मार्ग से चलते हुए (अस्मयु) = हमारी प्राप्ति की कामनावाले होते हैं, (एषाम्) = इनका (विश्रावि) = श्रव [=यश] चारों ओर फैलता है।
Connotation: - भावार्थ - हम 'दुःशीम, पृथवान, वने, राम, असुर व मघवान्' बनें जिससे प्रभु के ज्ञान का हमारे लिये प्रवचन हो ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ये-अस्मयु) ये हितैषिणो विद्वांसोऽस्मान् कामयमानाः “सुपां सुलुक्…” [अष्टा० ७।१।३९] इति जसो लुक् (पञ्चशता युक्त्वाय) पञ्चशतानि-इव ‘लुप्तोपमावाचकालङ्कारः’ अश्वान्-इन्द्रियाणि पञ्चशतगुणितशक्तिमन्ति योजयित्वा (पथा) ज्ञानमार्गेण ज्ञानप्रदानक्रमेण (विश्रावि) विशेषेण श्रावणीयं परमात्मज्ञानम् (एषाम्) एतेषां खलु (तत्) तच्छ्रावितं (दुःशीमे) दुःशयनस्थाने यत्र दुःखेन जनाः शेरते तत्र कष्टस्थाने “शीङ् धातोर्मन् प्रत्यय औणादिको बाहुलकात्” (पृथवाने) विस्तीर्यमाणो (वेने) कामयमाने (रामे) भोगेषु जनवर्गे (मघवत्सु) जनेषु (प्रवोचम्) प्रवचनं कुर्याम् ॥१४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - To the restless, celebrated, emotional, sensual, exuberant and powerful, let me speak of that knowledge and wisdom which is heard of these our well wishers of humanity who control and direct five hundred fluctuations of their mind by meditation to peace and divinity. (That is the path of living, knowing and speaking.)