'दुःशीम- पृथवान - वने - राम- असुर- मघवान्'
Word-Meaning: - [१] प्रभु कहते हैं कि (तद्) = उस गतमन्त्र के (हिरण्य) = हितरमणीय ज्ञान को (दुःशीमे) = सब बुराइयों को शान्त करनेवाले में, सब वासनाओं को जीतनेवाले में पृथवाने वासनाओं को जीतकर शक्तियों का विस्तार करनेवाले में और इस प्रकार (वेने) = अपने जीवन को कान्त व सुन्दर बनानेवाले में (प्रवोचम्) = कहता हूँ। [२] इस ज्ञान का मैं रामे भक्ति में रमण करनेवाले में अथवा संसार की सब क्रियाओं को एक क्रीड़क की मनोवृत्ति से करनेवाले में [रम् क्रीडायाम्], (असुरे) = प्राणशक्ति में रमण करनेवाले में [असुषु रमते] = प्राणायामादि द्वारा प्राणशक्ति को बढ़ानेवाले में तथा (मघवत्सु) = [मघ- ऐश्वर्य तथा यज्ञ 'मख'] ऐश्वर्यशाली तथा अपने ऐश्वर्य का यज्ञों में विनियोग करनेवालों में (प्र अवोचम्) = प्रवचन करता हूँ। [३] इस ज्ञान को प्राप्त करके इस ज्ञान के अनुसार (ये) = जो (पञ्च) = पाँचों प्राणों, पाँचों कर्मेन्द्रियों, पाँचों ज्ञानेन्द्रियों व अन्तःकरण पंचक को [मन-बुद्धि-चित्त- अहंकार - हृदय] (शता) = सौ के सौ वर्ष तक युक्त्वाय शरीररूप रथ में ठीक प्रकार से जोतकर (पथा) = मार्ग से चलते हुए (अस्मयु) = हमारी प्राप्ति की कामनावाले होते हैं, (एषाम्) = इनका (विश्रावि) = श्रव [=यश] चारों ओर फैलता है।
Connotation: - भावार्थ - हम 'दुःशीम, पृथवान, वने, राम, असुर व मघवान्' बनें जिससे प्रभु के ज्ञान का हमारे लिये प्रवचन हो ।