प्रभु हमारी प्रार्थना को सुनें
Word-Meaning: - [१] (उत) = और (स्यः) = वह (कवि) = क्रान्तदर्शी - सर्वज्ञ प्रभु, (अहि:) = कभी भी हीन न होनेवाला, (बुध्न्यः) = सबके मूल में विद्यमान सर्वाश्रय प्रभु (नः) = हम (उशिजाम्) = मेधावियों की (हवीमनि) = पुकार के होने पर (उर्विया) = खूब ही (शृणोतु) = सुने। हम मेधावी बनकर प्रभु का आराधन करें, जिससे हमारी आराधना उस सर्वज्ञ, अहीन, सर्वाश्रय प्रभु के द्वारा अवश्य सुनी जाए। प्रभु सर्वज्ञ होने से हमारी आवश्यकता को हमारी अपेक्षा अधिक ठीक ही जानते हैं। 'अहीन' होने से वे हमारी प्रार्थना को पूर्ण करने की क्षमता रखते हैं। सर्वाश्रय होने से आधार देने योग्य को वे आधार देते ही हैं। [२] (दिविक्षिता) = द्युलोक में निवास करनेवाले, (विचरन्ता) = विभिन्न मार्गों में गति करते हुए (सूर्यामासा) = सूर्य और चन्द्र [ चन्द्रमा:- माः ] तथा (शमीनहुषी) = [ शमी - कर्म] सब कर्मों की आधारभूत यह पृथिवी तथा [नह बन्धने] लोक-लोकान्तरों को अपने में बाँधनेवाला यह द्युलोक (धिया) = बुद्धि के द्वारा (अस्य) = हमारी इस प्रार्थना को (बोधतम्) = जानें । अर्थात् सूर्य, चन्द्र, द्युलोक तथा पृथ्वीलोक सभी हमारे अनुकूल होकर हमारी बुद्धि को बढ़ानेवाले हों, जिस बुद्धि से हम अभीष्ट पुरुषार्थों को सिद्ध कर पायें।
Connotation: - भावार्थ- हम समझदार बनकर प्रभु का आराधन करें, प्रभु हमारी प्रार्थना को सुनें। सूर्य, चन्द्र, द्युलोक व पृथ्वीलोक हमारी बुद्धि को बढ़ानेवाले हों।