Word-Meaning: - [१] (वातोपधूतः) = [वात प्राण] प्राणायाम के द्वारा जिसने वासनाओं को कम्पित करके दूर कर दिया है और अपने वासनाशून्य हृदय में (इषित:) = जिसने प्रभु प्रेरणा को प्राप्त किया है। इस प्रेरणा को प्राप्त करके (यत्) = जो (वशान् अनु) = इन्द्रियों को वश में करने के अनुसार (तृषु) = शीघ्र (अन्ना) = अन्नों का (वेविषद्) = व्यापन करता हुआ, अर्थात् सात्त्विक अन्नों को ही खाता हुआ, (वितिष्ठसे) = विशेषरूप से स्थित होता है । [२] ऐसा होने पर (ते) = तेरे (रथ्यः) = ये शरीररूप रथ में जुतनेवाले इन्द्रियाश्व (यथा-पृथक्) = जिस-जिस कार्य के लिए वे उद्दिष्ट हैं, उस-उस कार्य में (आयतन्ते) = सब प्रकार से यत्नशील होते हैं । कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों को ठीक से करती हैं, और ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में प्रवृत्त रहती हैं । [३] इस प्रकार इन्द्रियों को ठीक से स्वकार्य में प्रवृत्त रहने पर, हे अग्ने प्रगतिशील जीव ! (धक्षतः) = वासनाओं का दहन करनेवाले तेरी शर्धांसि शक्तियाँ अजराणि जीर्ण होनेवाली नहीं होती ।
Connotation: - भावार्थ- प्राणायाम के द्वारामलों को दूर कर के प्रभु प्रेरणा को सुनें । सात्त्विक अन्न खाएँ, इन्द्रियों को स्वकार्य में प्रवृत्त रखें और इस प्रकार अजीर्ण शक्तिवाले बनें ।