Word-Meaning: - [१] (त्रिपात् पुरुषः) = त्रिपात् पुरुष (ऊर्ध्व उदैत्) = इस चराचर जगत् से ऊपर उठा हुआ है। (अस्य) = इस पुरुष का (पादः) = एक अंश ही (पुनः) = तो (इह अभवत्) = यहाँ इस ब्रह्माण्ड में होता है । सम्पूर्ण संसार का व्यवहार इस एक अंश में ही चल रहा है, प्रभु के तीन अंश तो इस व्यावहारिक संसार से ऊपर ही हैं । [२] इस (साशनानशने) = अशन सहित और अशनरहित संसार दो भागों में बँटा हुआ है, यही चराचर कहलाता है। इस चराचर संसार में (ततः) = उस प्रभु से ही विष्वड् [विषु अञ्च्] विविध दिशाओं में गति करनेवाला या विविध योनियों में प्रविष्ट होकर गति करनेवाला यह सारा संसार (व्यक्रामत्) = विविध गतियोंवाला होता है । सम्पूर्ण संसार की गति के स्रोत वे प्रभु ही हैं। [३] (अभि) = ये सारे प्राणी अन्ततः उस प्रभु की ओर ही चल रहे हैं। सबका अन्तिम लक्ष्य वह प्रभु ही है। वहाँ पहुँचकर ही यात्रा का अन्त होता है ।
Connotation: - भावार्थ- सम्पूर्ण संसार की गति के स्रोत वे प्रभु ही हैं। यह ब्रह्माण्ड उस प्रभु की ओर ही चल रहा है ।