Go To Mantra

स सूर्य॒: पर्यु॒रू वरां॒स्येन्द्रो॑ ववृत्या॒द्रथ्ये॑व च॒क्रा । अति॑ष्ठन्तमप॒स्यं१॒॑ न सर्गं॑ कृ॒ष्णा तमां॑सि॒ त्विष्या॑ जघान ॥

English Transliteration

sa sūryaḥ pary urū varāṁsy endro vavṛtyād rathyeva cakrā | atiṣṭhantam apasyaṁ na sargaṁ kṛṣṇā tamāṁsi tviṣyā jaghāna ||

Pad Path

सः । सूर्यः॑ । परि॑ । उ॒रु । वरां॑सि । आ । इन्द्रः॑ । व॒वृ॒त्या॒त् । रथ्या॑ऽइव । च॒क्रा । अति॑ष्ठन्तम् । अ॒प॒स्य॑म् । न । सर्ग॑म् । कृ॒ष्णा । तमां॑सि । त्विष्या॑ । ज॒घा॒न॒ ॥ १०.८९.२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:89» Mantra:2 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:14» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:2


Reads 367 times

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सः) वह (सूर्यः-इन्द्रः) अच्छा प्रेरक ऐश्वर्यवान् परमात्मा (उरू वरांसि) बहुत वेष्टनवातावरणों को (रथ्या-इव चक्रा) रथसम्बन्धी चक्रों कि भाँति (परि-आ ववृत्यात्) नियम से घुमाता है, जिनमें वेष्टनवातावरण वर्तमान है (अतिष्ठन्तम्) निरन्तर चलायमान (अपस्यम्) कर्मनिमित्त (सर्गं न) सृजे हुए जगत् को भी सम्प्रति सदा घुमाता है (त्विष्या कृष्णा तमांसि जघान) दीप्तिवाले ज्ञानप्रकाश से अज्ञानान्धकारों को जीवों के अन्दर से नष्ट करता है ॥२॥
Connotation: - परमात्मा समस्त आकाशीय गोलों-पिण्डों के वेष्टनों-वातावरणों को घुमाता है, अपितु समस्त उत्पन्न जगत् को भी घुमाता है, जीवों के अन्दर से अज्ञानान्धकारों को नष्ट करता है, कर्मनिमित्त शरीरधारण कराता है ॥२॥
Reads 367 times

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सूर्यों के सूर्य प्रभु

Word-Meaning: - [१] (स) = वे प्रभु (सूर्यः) = [सुवति] सबको प्रेरित करनेवाले हैं। ये प्रभु ही (इन्द्र:) = सब शक्ति के कर्मों को करनेवाले हैं [सर्वाणि बलकर्माणि इन्द्रस्य नि०] । ये (उस) = अनन्त (वरांसि) = अन्धकार निवारक तेजों को तेजोमय सूर्यादि पिण्डों को (परि आववृत्यात्) = चारों ओर गति दे रहे हैं, उसी प्रकार गति दे रहे हैं (इव) = जैसे (रथ्या चक्रा) = एक रथ के चक्रों को गति दी जाती है। [२] वे प्रभु सूर्यादि ज्योतिर्मय पिण्डों को तो गति दे ही रहे हैं, इसी प्रकार वे (अतिष्ठन्तम्) = इस कभी न रुकनेवाले (अपस्यं न) = सदा कर्ममय के समान, अर्थात् सतत क्रियाशील (सर्गम्) = सृष्टि प्रवाह को भी वे प्रभु चक्राकार गति दे रहे हैं। इस सृष्टि में वे (कृष्णा तमांसि) = अत्यन्त काले अन्धकारों को (त्विष्या) = दीप्ति से जघान नष्ट करनेवाले हैं। हृदयों में प्रभु का प्रकाश होते ही वासनाओं से जनित घना अन्धेरा समाप्त हो जाता है ।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु विशाल ज्योतिर्मय पिण्डों को रथ-चक्रों के समान गति दे रहे हैं। सृष्टिचक्र को भी वे ही चला रहे हैं और हमारे हृदयों के वासनाजनित अन्धकार को भी वे ही अपनी दीप्ति से नष्ट करते हैं ।
Reads 367 times

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (सः-सूर्यः-इन्द्रः) स सु-प्रेरकः “सूर्यः स्वीर्यते वा” [निरु० १२।१४] ऐश्वर्यवान् परमात्मा (उरू वरांसि) उरूणि बहूनि वेष्टनवातावरणानि (रथ्या-इव चक्रा) रथ-सम्बन्धीनि चक्राणि-इव (परि-आ ववृत्यात्) पर्यावर्तयति नियमेन परिभ्रामयति येषु वर्तमानम् (अतिष्ठन्तम्-अपस्यं सर्गं न) निरन्तरं चलायमानं कर्मनिमित्तं सृष्टं जगच्च पर्यावर्तयति सम्प्रति (त्विष्या कृष्णा तमांसि जघान) स्वतेजसा-ज्ञानप्रकाशेन कृष्णरूपाणि तमांसि जीवात्मनामज्ञानान्धकारांश्च नाशयति ॥२॥
Reads 367 times

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, self-refulgent cosmic Sun, greater than the greatest, he moves the worlds of existence like chariot wheels and, destroying the deepest darknesses of the world with his refulgence, keeps the dynamic universe in ceaseless flow like a particle in a wave of energy.