दो मार्ग [देवों का, मर्त्यो का]
Word-Meaning: - [१] (अहम्) = मैं (पितॄणाम्) = [पा रक्षणे] धर्म का रक्षण करनेवालों के (द्वे स्रुती) = दो मार्गों को (अशृणवम्) = सुनता हूँ, एक मार्ग तो (देवानाम्) = देवों का है, (उत) = और दूसरा मार्ग (मर्त्यानाम्) = मनुष्यों का है। शास्त्रविहित कर्मों को सामान्य मनुष्य विविध कामनाओं से प्रेरित होकर करते हैं। वेदों के अर्थवाद उन्हें उन उन यज्ञों के प्रति रुचिवाला बनाते हैं। इन सकाम कर्मों को करते हुए वे स्वर्ग को अवश्य प्राप्त करते हैं। परन्तु 'ते तं मुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' वे सकाम कर्मों में रत पुरुष विशाल स्वर्गलोक का उपभोग करके फिर से मर्त्यलोक में प्रवेश करते हैं । इस प्रकार ये नाना कामनाओं से आन्दोलित होनेवाले मर्त्य 'गतागतं कामकामा त्वमन्ते'- आने और जाने के चक्र में फँसे रहते हैं । [२] इन सामान्य मनुष्यों से भिन्न वे देववृत्ति के पुरुष हैं, जो ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करके, इन सांसारिक कामनाओं में न उलझते हुए अपने नियत कर्मों को कर्त्तव्य भावना से करते हैं। अपने कर्त्तव्य पर ही बल देते हैं, फल पर नहीं। ये देववृत्ति के पुरुष ब्रह्मलोक को प्राप्त करनेवाले होते हैं । [३] इस प्रकार (इदं विश्वम्) = यह सब (यत्) = जो (पितरं मातरं च अन्तरा) = द्युलोक व पृथ्वीलोक के मध्य में होनेवाले मनुष्य हैं, भिन्न-भिन्न लोकों में जन्म लेनेवाले मनुष्य हैं, वे सबके सब (एजत्) = गति करते हुए (ताभ्याम्) = उन दो मार्गों से ही (स्येति) = गति करते हैं। एक सकाम कर्म मार्ग है, दूसरा निष्काम कर्म मार्ग। निचली श्रेणी के धर्मात्माओं का मार्ग सकाम है, उपरलों का निष्काम ।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रयत्न करें कि मर्त्यो के 'सकाम कर्म मार्ग' से ऊपर उठकर देवों के निष्काम कर्म मार्ग से गतिवाले हों ।