Word-Meaning: - [१] (कवयः) = कान्तदर्शी तत्त्वज्ञानी, (यज्ञियासः) = यज्ञादि उत्तम कर्मों को करनेवाले, (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष उस (अग्निम्) = अग्रेणी प्रभु को (अजनयन्) = अपने में प्रादुर्भूत करते हैं, हृदय देश में उसके दर्शन करते हैं । उस प्रभु का दर्शन करते हैं जो (वैश्वानरम्) = सब नरों का हित करनेवाले हैं। (अजुर्यम्) = कभी जीर्ण होनेवाले नहीं अजर व अमर हैं। (नक्षत्रम्) = [नक्ष् to go, to corre near] गतिशील हैं व सबको समीपता से प्राप्त हैं, सर्वव्यापक हैं । (प्रत्नम्) = सनातन हैं, (अमिनत्) = न हिंसा करनेवाले व न हिंसित होनेवाले हैं । (चरिष्णु) = प्रलयकाल के समय सबको चर जानेवाले, अपने में निगीर्ण कर लेनेवाले हैं । [२] (यक्षस्य) = आत्मा को इन्द्रियों के साथ जोड़नेवाले इस मन के अध्यक्ष हैं। मन संसार की किसी भी वस्तु में स्थिर नहीं हो पाता, परन्तु यदि कभी इस परमात्मा की ओर आता है तो इस प्रकार इसमें उलझता है कि अपनी तीव्र गति से चलता हुआ भी इसके ओर छोर को नहीं पा पाता और उससे फिर निकल नहीं पाता ऐसी स्थिति में ही इसका विषयों में भटकना रुकता है। (तविषम्) = ये प्रभु महान् हैं, (बृहन्तम्) = वर्धमान हैं । प्रभु अपनी विशालता से सारे ब्रह्माण्ड को व्याप्त किया हुआ है और वे प्रभु सब गुणों से बढ़े हुए हैं, वस्तुतः सब गुणों की चरमसीमा हैं, सब गुण उनमें निरतिशयरूप में हैं। इस प्रभु का ही देव हृदय में साक्षात्कार करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- हम कवि यज्ञिय व देव बनकर प्रभु का दर्शन करें।