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अग्ने॒ त्वचं॑ यातु॒धान॑स्य भिन्धि हिं॒स्राशनि॒र्हर॑सा हन्त्वेनम् । प्र पर्वा॑णि जातवेदः शृणीहि क्र॒व्यात्क्र॑वि॒ष्णुर्वि चि॑नोतु वृ॒क्णम् ॥

English Transliteration

agne tvacaṁ yātudhānasya bhindhi hiṁsrāśanir harasā hantv enam | pra parvāṇi jātavedaḥ śṛṇīhi kravyāt kraviṣṇur vi cinotu vṛkṇam ||

Pad Path

अग्ने॑ । त्वच॑म् । या॒तु॒ऽधान॑स्य । भि॒न्धि॒ । हिं॒स्रा । अ॒शनिः॑ । हर॑सा । ह॒न्तु॒ । ए॒न॒म् । प्र । पर्वा॑णि । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । शृ॒णी॒हि॒ । क्र॒व्यात् । क्र॒वि॒ष्णुः । वि । चि॒नो॒तु॒ । वृ॒क्णम् ॥ १०.८७.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:87» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:5» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः-अग्ने) हे प्राप्त अवसर को जाननेवाले अग्रणी सेनानायक !  तू (यातुधानस्य-त्वचं भिन्धि) यातना देनेवाले की त्वचा को उखेड़ दे (हिंस्रा-अशनिः-हरसा-एनं हन्तु) नाशकारिणी विद्युत् अपने तेज से उनको मारे (पर्वाणि प्र शृणीहि) जोड़ों-अङ्गों को तोड़ दे (वृक्णं क्रविष्णुः क्रव्यात्-विचिनोतु) कटे हुए शरीर को मांस इच्छुक मांसभक्षक पशु-पक्षी नोच-नोच कर खावें ॥५॥
Connotation: - सेनानायक शस्त्रास्त्रों एवं विद्युत्शक्ति के प्रहारों से शत्रुओं के अङ्गों को तोड़-फोड़ दे, त्वचा को छिन्न-भिन्न कर दे, वे भागने के योग्य भी न रहें, उन्हें मांसभक्षक पशु-पक्षी नोच-नोच कर खा डालें ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

यातुधान का परिवर्तन

Word-Meaning: - [१] हे (अग्रे) = राष्ट्र को उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले राजन् ! (यातुधानस्य) = इस प्रजापीड़क के (त्वचम्) = सम्पर्क को (भिन्धि) = तोड़ दे। इसे अपने साथियों से अलग कर दे। अलग होने पर यह अपने जीवन के मार्ग के विषय में ठीक सोच सकता है। [२] (हिंस्राशनिः) - [हिंस्रः चासौ अशनि :-master] अज्ञान को नष्ट करनेवाला अध्यापक (हरसा) = वासनाओं को विनष्ट करने की शक्ति से (एनं हन्तु) = इस यातुधान को प्राप्त हो [ हन् गतौ ] । वह ज्ञान देकर इसे अधर्म मार्ग से हटानेवाला हो। [३] हे (जातवेदः) = ज्ञानी पुरुष ! तू (पर्वाणि) = [ knots] इसकी वासना ग्रन्थियों को प्रशृणीहि प्रकर्षेण नष्ट करनेवाला बन । ज्ञान के द्वारा तू इसे वासनामय जगत् से ऊपर उठा । तू उसे इस प्रकार का ज्ञान दे कि यह (क्रविष्णुः) = औरों के मांस की इच्छावाला (क्रव्यात्) = मांस- भक्षक पुरुष औरों के नाश में लगा हुआ पुरुष (वृक्णम्) = छेदों व दोषों को विचिनोतु अपने से पृथक् करनेवाला हो। यह औरों के विनाश पर अपने आमोद के भवन को न खड़ा करे ।
Connotation: - भावार्थ- यातुधान को राजा उसके साथियों से अलग करे। ज्ञानी उसे ज्ञान देने के लिये प्राप्त हो और ज्ञान देकर उसकी वासना-ग्रन्थियों को विनष्ट करे ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः-अग्ने) हे प्राप्तावसरस्य वेदितः ! अग्रणीः ! सेनानायक ! त्वं (यातुधानस्य त्वचं भिन्धि) यातनाधारकस्य त्वचं छिन्नां कुरु (हिंस्रा-अशनिः-हरसा-एनं हन्तु) नाशकारिणी विद्युत् स्वतेजसा खल्वेतं मारयतु (पर्वाणि प्र शृणीहि) परूंषि अङ्गानि त्वं त्रोटय (वृक्णं क्रविष्णुः क्रव्यात्-विचिनोतु) छिन्नं शरीरं मांसेच्छुको मांसभक्षकः पशुः पक्षी वा पृथक् कृत्वा भक्षयतु ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Agni, Jataveda, present everywhere, break through the cover, camouflage, secret shelters and hideouts of the elements of evil, violence and sabotage with fatal light and penetrative power, split up every section and every unit of it to bits, disperse and destroy them all, and let the fire which consumes the dead collect and consume the remains and reduce them to ash.