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अयो॑दंष्ट्रो अ॒र्चिषा॑ यातु॒धाना॒नुप॑ स्पृश जातवेद॒: समि॑द्धः । आ जि॒ह्वया॒ मूर॑देवान्रभस्व क्र॒व्यादो॑ वृ॒क्त्व्यपि॑ धत्स्वा॒सन् ॥

English Transliteration

ayodaṁṣṭro arciṣā yātudhānān upa spṛśa jātavedaḥ samiddhaḥ | ā jihvayā mūradevān rabhasva kravyādo vṛktvy api dhatsvāsan ||

Pad Path

अयः॑ऽदंष्ट्रः । अ॒र्चिषा॑ । या॒तु॒ऽधाना॑न् । उप॑ । स्पृ॒श॒ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । सम्ऽइ॑द्धः । आ । जि॒ह्वया॑ । मूर॑ऽदेवान् । र॒भ॒स्व॒ । क्र॒व्य॒ऽअदः॑ । वृ॒क्त्वी । अपि॑ । ध॒त्स्व॒ । आ॒सन् ॥ १०.८७.२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:87» Mantra:2 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:5» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:2


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः) हे प्राप्त अवसर को जाननेवाले (अयोदंष्ट्रः) लोहे के दाड़ों के समान तीक्ष्ण शस्त्रवाले सेनानायक ! (अर्चिषा) तेज से (यातुधानान्) पीड़ाधारक-पीड़ा देनेवाले को (उप स्पृश) पकड़-स्वाधीन कर (जिह्वया) प्रबल वाणी-ललकार से (मूरदेवान्) मूढ़ मनवाले-भ्रान्त करके (आ रभस्व) दबा (क्रव्यादः-वृक्त्वी-आसन्) मांसभक्षकों को उनके कार्य से वर्जित करके पुनः अपने मुख में प्रमुख बन्धन में (अपि-आ धत्स्व) बन्धी बना ॥२॥
Connotation: - सेनानायक अवसर को जाननेवाला तीक्ष्ण शस्त्रों से शत्रुओं को अपने अधीन करे तथा ललकारमात्र से उनको भ्रान्त करनेवाला हिंसक शत्रुओं को बन्धन में डालनेवाला होना चाहिये ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

ज्ञानाग्नि में पाप का भस्म होना

Word-Meaning: - [१] हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो ! (समिद्धः) = गत मन्त्र के अनुसार क्रतुओं द्वारा दीप्त होने पर (अयोद्रंष्ट्रः) = तीक्ष्ण दंष्ट्राओंवाले आप (अर्चिषा) = अपनी ज्ञान ज्वाला से (यातुधानान्) = पीड़ा का आधान करनेवाली इन राक्षसी वृत्तियों को (उपस्पृश) = समीपता से स्पर्श करते हुए भस्म कर देते हैं। आपके द्वारा सब अशुभ वृत्तियाँ दूर की जाती हैं । [२] आप (मूरदेवान्) = [दिव्-व्यवहारे] मूढ़तापूर्ण व्यवहारवालों को (जिह्वया) = ज्ञान ज्वाला के द्वारा [flame] (आरभस्व) = [to form] उत्तम जीवनवाला बनाइये । (क्रव्यादः) = मांस भक्षण करनेवालों को (वृक्त्वी) = इन अशुभ कर्मों से पृथक् करके (आसन्) = अपने मुख में, उपासना में (अपिधत्स्व) = धारण करिये। ज्ञान को प्राप्त करके हमारी वृत्ति अशुभ कर्मों से, मांस भक्षणादि से हटें और हम शुभ कर्मों में प्रवृत्त हों। उन कर्मों को हम कभी न करें जिनसे औरों की हानि करके अपनी मौज को प्राप्त करने की भावना हो ।
Connotation: - भावार्थ - ज्ञान ज्वाला से अशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं । उपासना के द्वारा जीवन की पवित्रता होती है।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (जातवेदः) जातं प्राप्तमवसरं वेत्ति यः सः सम्बुद्धौ जातवेदः ! अवसरस्य वेत्तः ! सेनानायक ! (यो दंष्ट्रः) अयसो दंष्ट्रा दंशनः शस्त्रविशेषो यस्य स तथाभूतः “अयोदंष्ट्रान् अयोदंष्ट्रा येषु तान्” [ऋ० १।८८।५ दयानन्दः] (समिद्धः) प्रसिद्धः सन् (अर्चिषा) तेजसा ‘अर्चिः-तेजः’ [ऋ० ४।७।१ दयानन्दः] (यातुधानान्-उप-स्पृश) यातनाधारकान् दुष्टान् उपगृहाण स्वाधीनान् कुरु (जिह्वया) प्रबलवाचा “जिह्वा वाङ्नाम” [निघ० १।११] (मूरदेवान्) मूढो देवो येषां तथाभूतान् “मनो देवः” [गो० १।२।१०] भ्रान्तान् कृत्वा (आ रभस्व) आक्राम (क्रव्यादः-वृक्त्वी-आसन्-अपि-आधत्स्व) मांसभक्षकान् तत्कार्याद्वर्जयित्वा पुनः स्वकीये मुखे प्रमुखे बन्धने स्थाने विधेहि बन्धी कुरु ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Omnipresent spirit of life and protection of existence, blazing with flames of fire and fierce with jaws of steel, destroy the anti-life elements with the touch of your lazer beams, seize the agents of death with flames, catch the blood suckers and flesh eaters with the jaws and crush them to naught.