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नाहमि॑न्द्राणि रारण॒ सख्यु॑र्वृ॒षाक॑पेॠ॒ते । यस्ये॒दमप्यं॑ ह॒विः प्रि॒यं दे॒वेषु॒ गच्छ॑ति॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

English Transliteration

nāham indrāṇi rāraṇa sakhyur vṛṣākaper ṛte | yasyedam apyaṁ haviḥ priyaṁ deveṣu gacchati viśvasmād indra uttaraḥ ||

Pad Path

न । अ॒हम् । इ॒न्द्रा॒णि॒ । र॒र॒ण॒ । सख्युः॑ । वृ॒षाक॑पेः । ऋ॒ते । यस्य॑ । इ॒दम् । अप्य॑म् । ह॒विः । प्रि॒यम् । दे॒वेषु । गच्छ॑ति । विश्व॑स्मात् । इन्द्रः॑ । उत्ऽत॑रः ॥ १०.८६.१२

Rigveda » Mandal:10» Sukta:86» Mantra:12 | Ashtak:8» Adhyay:4» Varga:3» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:7» Mantra:12


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्राणि) हे व्योमकक्षा ! (वृषाकपेः सख्युः-ऋते) सूर्य सखीभूत-पुत्र के विना (अहं न रराण) मैं रमण नहीं करता हूँ, शान्ति को प्राप्त नहीं करता हूँ (यस्य-इदम्-अप्यम्) जिस सूर्य का यह अन्तरिक्ष में जानेवाला (प्रियं हविः) अभीष्ट रश्मितेज (देवेषु गच्छति) ग्रह नक्षत्रों में जाता है ॥१२॥ 
Connotation: - सूर्य के बिना उत्तर ध्रुव का कार्य नहीं चलता है, आकाश के सब गोलों में सूर्य का रश्मितेज पहुँचता है ॥१२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सृष्टि निर्माण जीव के लिये

Word-Meaning: - [१] प्रभु प्रकृति से कहते हैं कि (इन्द्राणि) = हे प्रकृति ! (अहम्) = मैं (सख्युः) = इस मित्र 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया०' (वृषाकपेः) = वासनाओं को कम्पित करके दूर करनेवाले और अतएव शक्तिशाली इस वृषाकपि के (ऋते) = बिना (न रारणे) = इस सृष्टिरूप क्रीड़ा को नहीं करता हूँ । यह सृष्टिरूप क्रीड़ा इस मित्र जीव के लिये ही तो है । आप्तकाम होने से मुझे इसकी आवश्यकता नहीं, जड़ता के कारण तुझे [ प्रकृति को इसकी जरूरत नहीं । जीव इसमें साधन-सम्पन्न होकर उन्नत होता हुआ मोक्ष तक पहुँचता है । [२] वह जीव (यस्य) = जिसकी (इदम्) = यह (अप्यं हविः) = रेतः कण सम्बन्धी (हवि प्रियम्) = इसे प्रीणित करनेवाली होती है और इसके शरीर को कान्ति प्रदान करती है तथा (देवेषु गच्छति) = सब इन्द्रियरूप देवों में जाती है। रेतः कणों का रक्षण करना ही शरीर में इस 'अप्य हवि' को आहुत करना है । यह हवि शरीर को कान्त बनाती है और सब इन्द्रियों को सशक्त बनाती है। [२] इस (अप्यं हवि) = के द्वारा सब शक्तियों का वर्धन करके यह जीव अनुभव करता है कि (इन्द्र:) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु (विश्वस्मात् उत्तरः) = सब से अधिक उत्कृष्ट हैं ।
Connotation: - भावार्थ- प्रभु इस सृष्टि का निर्माण जीव के लिये करते हैं। भोगों में न फँसकर जब यह शक्ति को शरीर में ही सुरक्षित करता है, तो प्रभु को पहचान पाता है।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्राणि) हे इन्द्राणि ! व्योमकक्षे ! (सख्युः-वृषाकपेः-ऋते-अहं न रराण) सखिभूताद् वृषाकपेः सूर्यादृते नाहं रमामि न शान्तिं लभे (यस्य-इदम्-अप्यं प्रियं हविः-देवेषु गच्छति) यस्य वृषाकपेः सूर्यस्य खल्विदमन्तरिक्षगामिप्रियरश्मितेजः “आपोऽन्तरिक्षनाम” [निघ० १।३] द्युस्थानगतेषु लोकेषु गच्छति “देवो द्युस्थानो भवतीति वा” [निरु० ७।१५] ॥१२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O divine consort, Indrani, I never enjoy the play of existence without my friend and companion, Vrshakapi, generous playful humanity, since the havi given by him and given for nature and humanity goes up and reaches the divinities which I share.$Indra is supreme over all.