Word-Meaning: - [१] पतिगृह को जाते समय पिता कन्या को अन्तिम उपदेश देता है कि (पूषा) = पोषण करनेवाला यह (पति हस्तगृह्य) = पाणिग्रहण करके, यथाविधि तेरे हाथ का ग्रहण करके (त्वा) = तुझे (इतः नयतु) = यहाँ से अपने घर ले जाये । इस समय (अश्विना) = तेरे धर्मपिता व धर्ममाता (त्वा) = तुझे रथेन रथ के द्वारा (प्रवहताम्) = घर की ओर ले जानेवाले हों। [२] तू (गृहान् गच्छ) = पतिगृह की ओर जानेवाली हो, (यथा) = जिससे तू गृहपत्नी (असः) = वहाँ जाकर गृहपत्नी बन पाये । तूने गृह की पत्नी बनना है, सारे गृह के रक्षण के उत्तरदायित्व को अपने कन्धे पर लेना है। घर के सारे प्रबन्ध का भार उठाना है। इसके लिये आवश्यक है कि (वशिनी) = अपनी सब इन्द्रियों को वश में करनेवाली (त्वम्) = तू (विदथम्) = ज्ञानपूर्वक समझदारी से आवदासि सब बात करनेवाली हो । तेरी सब बातें बड़े सोच-विचार के साथ हों । तेरी प्रत्येक बात का घर पर प्रभाव पड़ना है। सो अपना नियन्त्रण करती हुई, समझदारी से सब बात करती हुई सच्चे अर्थों में गृहपत्नी बनना ।
Connotation: - भावार्थ- गृहपत्नी के लिये आवश्यक है कि - [क] सब इन्द्रियों को वश में करके चले तथा [ख] सब बातें समझदारी से करे। ऋ