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न तं वि॑दाथ॒ य इ॒मा ज॒जाना॒न्यद्यु॒ष्माक॒मन्त॑रं बभूव । नी॒हा॒रेण॒ प्रावृ॑ता॒ जल्प्या॑ चासु॒तृप॑ उक्थ॒शास॑श्चरन्ति ॥

English Transliteration

na taṁ vidātha ya imā jajānānyad yuṣmākam antaram babhūva | nīhāreṇa prāvṛtā jalpyā cāsutṛpa ukthaśāsaś caranti ||

Pad Path

न । तम् । वि॒दा॒थ॒ । यः । इ॒मा । ज॒जान॑ । अ॒न्यत् । यु॒ष्माक॑म् । अन्त॑रम् । ब॒भू॒व॒ । नी॒हा॒रेण॑ । प्रावृ॑ताः । जल्प्या॑ । च॒ । अ॒सु॒ऽतृपः॑ । उ॒क्थ॒ऽशासः॑ । च॒र॒न्ति॒ ॥ १०.८२.७

Rigveda » Mandal:10» Sukta:82» Mantra:7 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:17» Mantra:7 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:7


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः-इमा जजान) जो परमात्मा इन लोक-लोकान्तरों को उत्पन्न करता है (तं न विदाथ) उसको नहीं जानते हो (युष्माकम्) तुम्हारे अन्दर (अन्यत्-अन्तरम्) भिन्न भेदक छिद्र (बभूव) है (नीहारेण) अज्ञानान्धकार से (प्रावृताः) बहुत आच्छादित हो, तथा (जल्प्या च) इधर-उधर जल्पना से-इधर-उधर भाषण से वाक्संयमरहितता से (असुतृपः) प्राणपोषक-स्वार्थपरायण-विषयपरायण (उक्थशासः) कथनमात्र-प्रशंसक (चरन्ति) मनुष्य विचरण करते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है ॥७॥
Connotation: - जिस परमात्मा ने सब लोक-लोकान्तरों को रचा है, उसको नहीं जानते हैं-नहीं स्मरण करते हैं, इसलिए कि मनुष्य के अन्दर दोष हैं, अज्ञानान्धकार तथा वासना का कुहरा, अन्यथा जल्पना, असंयत वाणी से मिथ्यास्तुति प्रशंसा किया करते हैं ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु से दूर क्यों ?

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्रों के अनुसार प्रभु सब प्रजाओं के गर्भ में स्थित हैं, वे सब सूर्यादि देवों को धारण किये हुए हैं । अन्दर होते हुए भी (तम्) = उस प्रभु को (न विदाथ) = तुम जानते नहीं । प्रभु वे हैं (यः) = जो (इमा जजान) = इन सब लोक-लोकान्तरों व शरीरों को उत्पन्न करते हैं । (अन्यत्) = शरीरों में रहनेवाले भी शरीर दुःखों से न दुःखी होनेवाले वे प्रभु विलक्षण हैं। (युष्माकं सन्तरं बभूव) = तुम्हारे अन्दर ही तो रह रहे हैं । [२] इतने समीप भी उस प्रभु को न जानने का कारण यह है कि सामान्यतः लोग (नीहारेण प्रावृताः) = अज्ञान के कुहरे से आच्छादित अन्तः तः करणवाले हैं। अज्ञान के आवरण के कारण उस हृदयस्थ प्रभु की दीप्ति को हम देख नहीं पाते। (जल्प्या:) = प्रायः लोक प्रवृत्ति गपशप मारते रहने की है, हम व्यर्थ की बातें बहुत करते हैं। यह प्रवृत्ति भी हमें अन्तर्मुख नहीं होने देती । अन्तर्मुख हुए बिना उस प्रभु के दर्शन सम्भव नहीं। (च) = और इसलिए भी हम प्रभु दर्शन नहीं कर पाते कि (असु-तृपः) = हम प्राण-पोषण ही में लगे रह जाते हैं, हमारी दुनियाँ खान-पान की ही बनी रहती है और उससे ऊपर न उठ सकने के कारण हम प्रभु-दर्शन से वञ्चित ही रह जाते हैं। अगली बात यह है कि लोग (उक्थशासः चरन्तिः) = स्तोत्रों का उच्चारण करते हुए ही विचरण करते हैं। यह कीर्तन भी पूरी तरह अन्तर्मुखी वृत्तिवाला नहीं होने देता। 'ताल ठीक हुई या नहीं' उधर ही ध्यान चला जाता है और प्रभु-दर्शन की हमारी तैयारी नहीं हो पाती।
Connotation: - भावार्थ-अज्ञान के कुहरे को दूर करेंगे, गपशप से पराङ्मुख होंगे, खान-पान की दुनियाँ से ऊपर उठेंगे और कीर्तन भी हमारे ध्यान को भंग करनेवाला न होगा तभी हम प्रभु-दर्शन कर पायेंगे। सूक्त का विषय यही है कि जितेन्द्रिय बनकर विश्वकर्मा भौवन बनते हुए ही हम उस विश्वकर्मा' प्रभु का दर्शन कर सकेंगे। यह 'विश्वकर्मा भौवन' अब 'मन्यु तापस' बनता है, ज्ञानी तपस्वी । अज्ञान के कुहरे को दूर करके ही तो प्रभु-दर्शन का सम्भव है-
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः-इमा जजान) यः परमात्मा खल्विमानि लोकलोकान्तराणि जनयति (तं न विदाथ) तं यूयं न जानीथ (युष्माकम्-अन्यत्-अन्तरं बभूव) युष्माकमन्तरे भिन्नं छिद्रं भेदकं भवति (नीहारेण प्रावृताः) अज्ञानान्धकारेण प्रकृष्टमावृता आच्छादिताः, तथा (जल्प्या च-असुतृपः-उक्थशासः-चरन्ति) इतस्ततो भाषणेन वाक्संयम-राहित्येन प्राणपोषकाः स्वार्थपरायणाः विषयपरायणाः-कथनमात्रप्रशंसकाः खलु विचरन्ति मनुष्या इति प्रसिद्धिः ॥७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - You do not comprehend that spirit which creates all these worlds of existence. That is something else, deeper than the deepest that you feel you are and know yourself. Covered by the fog of extrovert thought, playing with mere words, happy and satisfied with a breathing existence, singing songs of self-gratification, people roam around and miss the centre pole of the whirling worlds.