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विश्व॑कर्मन्ह॒विषा॑ वावृधा॒नः स्व॒यं य॑जस्व पृथि॒वीमु॒त द्याम् । मुह्य॑न्त्व॒न्ये अ॒भितो॒ जना॑स इ॒हास्माकं॑ म॒घवा॑ सू॒रिर॑स्तु ॥

English Transliteration

viśvakarman haviṣā vāvṛdhānaḥ svayaṁ yajasva pṛthivīm uta dyām | muhyantv anye abhito janāsa ihāsmākam maghavā sūrir astu ||

Pad Path

विश्व॑ऽकर्मन् । ह॒विषा॑ । व॒वृ॒धा॒नः । स्व॒यम् । य॒ज॒स्व॒ । पृ॒थि॒वीम् । उ॒त । द्याम् । मुह्य॑न्तु । अ॒न्ये । अ॒भितः॑ । जना॑सः । इ॒ह । अ॒स्माक॑म् । म॒घऽवा॑ । सू॒रिः । अ॒स्तु॒ ॥ १०.८१.६

Rigveda » Mandal:10» Sukta:81» Mantra:6 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:16» Mantra:6 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:6


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (विश्वकर्मन्) हे विश्व के रचनेवाले परमेश्वर ! (हविषा वावृधानः) अपनी ग्रहणशक्ति से विशेष वर्धन के हेतु (पृथिवीम्-उत द्याम्) पृथिवी और द्युलोक को (स्वयं) अपने में संगत करता है-ले लेता है प्रलयकाल में, (अन्ये जनासः) अन्य उत्पन्न होनेवाले जीव (अभितः-मुह्यन्तु) नितान्त मुग्ध हो जाते हैं (इह) इस स्थिति में (अस्माकं मघवा) हमारा मोक्षदाता परमात्मा (सूरिः-अस्तु) प्रेरक होवे-होता है ॥६॥
Connotation: - प्रलयकाल में द्युलोक पृथिवीलोकमय जगत् को सूक्ष्म करके परमात्मा अपनी ग्रहणशक्ति से अपने अन्दर ले लेता है-लीन कर लेता है और जीव मनुष्य आदि प्राणी मूर्छितरूप में रहते हैं। उसके उपासक जीवन्मुक्त उसकी प्रेरणा से मोक्ष का आनन्द लेते रहते हैं ॥६॥ 
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मघवा - सूरि

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र में जीव ने त्रिलोकी की शक्तियों के लिये आराधना की थी । प्रभु उसे प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि हे (विश्वकर्मन्) = अपने सब कर्त्तव्यों का पालन करनेवाले जीव ! तू (हविषा) = त्यागपूर्वक अदन से (वावृधानः) = खूब ही वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (स्वयम्) = अपने आप (पृथिवीं उत द्याम्) = पृथिवीलोक और द्युलोक को शरीर की शक्ति को व मस्तिष्क की दीप्ति को (यजस्व) = अपने साथ संगत कर। इनके प्राप्त करने के लिये तू यत्नशील होगा तो तुझे ये 'शक्ति व दीप्ति' क्यों न मिलेंगी? ये तुझे अवश्य प्राप्त होंगी ही । [२] प्रभु कहते हैं कि (अभितः) = चारों ओर होनेवाले (अन्वे जनासः) = अन्य लोग, अर्थात् सामान्य पुरुष (मुह्यन्तु) = चाहे मूढ़ बनें। वे हवि का सेवन करनेवाले न बनकर, अत्यन्त स्वार्थमय जीवन बिताते हुए, आसुरवृत्तिवाले बन जाएँ, पर (इह) = इस जीवन में (अस्माकम्) = हमारा यह भक्त तो (मघवा) = [मघ-मख] यज्ञशील व (सूरि:) = विद्वान्- समझदार (अस्तु) = हो । 'प्रभु का भक्त हो और अयज्ञिय व मूर्ख हो' ये तो परस्पर विरोधी बातें हैं । यज्ञशील व सूरि बनकर यह प्रभु-भक्त अपने शरीर को पृथिवी की तरह दृढ़ बनाता है और मस्तिष्क को द्युलोक के समान ज्ञान - ज्योति से चमकता हुआ बनाता है ।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु की प्रेरणा के अनुसार यज्ञशील व ज्ञानी बनते हुए शरीर व मस्तिष्क को बड़ा सुन्दर बनाएँ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (विश्वकर्मन्) हे विश्वरचयितः परमेश्वर ! (हविषा वावृधानः) आदानशक्त्या विशिष्ट-वर्धनहेतो: (पृथिवीम्-उत द्याम् स्वयं यजस्व) पृथिवी-लोकं द्युलोकं च स्वस्मिन् सङ्गमयसि (अन्ये जनासः) अन्ये जन्यमाना जीवाः (अभितः-मुह्यन्तु) नितान्तं मुग्धा भवन्ति (इह-अस्माकं मघवा सूरिः-अस्तु) अस्यां स्थितौ खल्वस्माकं प्रेरकः “सुमखस्य सूरिः॥ “सुमखस्य बलस्येरयिता” [निरु० १२।३] परमेश्वरो भवतु ॥६॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Vishvakarman, you yourself guide and perform the yajna of heaven and earth with the holy materials from within nature itself, yourself exlating in the expansive universe. Here the other people, unaware of the mystery, feel awe-stricken but, we pray, may you, Lord Almighty and omnificent, be the ultimate giver of enlightenment for us.