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किं स्वि॒द्वनं॒ क उ॒ स वृ॒क्ष आ॑स॒ यतो॒ द्यावा॑पृथि॒वी नि॑ष्टत॒क्षुः । मनी॑षिणो॒ मन॑सा पृ॒च्छतेदु॒ तद्यद॒ध्यति॑ष्ठ॒द्भुव॑नानि धा॒रय॑न् ॥

English Transliteration

kiṁ svid vanaṁ ka u sa vṛkṣa āsa yato dyāvāpṛthivī niṣṭatakṣuḥ | manīṣiṇo manasā pṛcchated u tad yad adhyatiṣṭhad bhuvanāni dhārayan ||

Pad Path

किम् । स्वि॒त् । वन॑म् । कः । ऊँ॒ इति॑ । सः । वृ॒क्षः । आ॒स॒ । यतः॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । निः॒ऽत॒त॒क्षुः । मनी॑षिणः । मन॑सा । पृ॒च्छत॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । तत् । यत् । अ॒धि॒ऽअति॑ष्ठत् । भुव॑नानि । धा॒रय॑न् ॥ १०.८१.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:81» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:16» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:4


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (किं स्वित्) कौन ही (वनम्) वन है (कः-उ) और कौन ही (सः-वृक्षः) वह वृक्ष (आस) है (यतः) जिससे (द्यावापृथिवी) द्युलोक पृथिवीलोक-द्यावापृथिवीमय जगत् को (निस्-ततक्षुः) नियम से तक्षक-बढ़ई की भाँति परमात्मा गढ़ता है-करता है (मनीषिण:) हे प्रज्ञावाले-बुद्धिमान् विद्वानों ! तुम (मनसा पृच्छत) मन से पूछो-विचारो (इत्-उ) अवश्य ही (तत्-यत्) वह जो (भुवनानि धारयन्) लोक-लोकान्तरों को धारण करता हुआ (अध्यतिष्ठत्) उनके ऊपर अधिष्ठित है ॥४॥
Connotation: - तक्षक-बढ़ई का अलङ्कार या रूपक देकर विचार किया गया है। इस द्यावपृथिवीमय जगत् का उपादानकारण कौन है और इसमें वर्तमान लोक-लोकान्तरों का धारण करनेवाला कर्त्ता निमित्तकारण कौन है, यह विचारना चाहिए ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

आरम्भण की अज्ञेयता

Word-Meaning: - [१] जैसे वर्तमान में एक बढ़ई किसी वन में किसी वृक्ष से लकड़ी को लेकर मेज आदि बनाने में प्रवृत्त होता है, इसी प्रकार (किं स्विद् वनम्) = वह वन कौन-सा था ? (उ) = और (स वृक्ष:) = वह वृक्ष (कः आस) = कौन - सा था, (यत:) = जिससे (द्यावापृथिवी) = ये द्युलोक और पृथिवीलोक (निष्टतक्षुः) = बनाये गये। [२] वह वन या उस वन का वह वृक्ष ही इस सृष्टि का उपादानकारण होगा, परन्तु उसके स्वरूप को हमारे लिये पूरा-पूरा जानने का सम्भव तो नहीं । उसे कैसे जाने ! इसके लिये कहते हैं कि (मनीषिणः) = हे बुद्धिमान् पुरुषो! (मनसा इत् उ) = मन से ही, अर्थात् मन को एकाग्र करके (तत्) = उससे (पृच्छत) = पूछो, (यत्) = जो (भुवनानि धारयन्) = इन सब भुवनों को धारण करता हुआ (अध्यतिष्ठत्) = अधिष्ठातृरूपेण वर्तमान है। इस आरम्भण भूत 'प्रकृति' का ज्ञान प्रभु ही ठीक-ठीक दे सकते हैं। प्रभु के अतिरिक्त इसके स्वरूप को कौन जानता है !
Connotation: - भावार्थ- सृष्टि के उपादानकारणभूत प्रकृति का रूप प्रभु से ही ठीक-ठीक प्रतिपादित होता है।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (किं स्वित्-वनं कः-उ सः-वृक्षः-आस) किं हि तद्वनं कश्च हि स वृक्षोऽस्ति (यतः) यस्मात् (द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः) द्यावापृथिवीमयं जगत् खलु नियमेन तक्षक इव करोति परमात्मा “ततक्षुः-चक्रुः” [निरु० ६।२७] “व्यत्ययेन बहुवचनम्” (मनीषिणः-मनसा पृच्छत-इत्-उ) हे प्रज्ञावन्तो विद्वान्सः ! यूयं मनसा पृच्छत-विचारयत ह्येव (तत्-यत्-भुवनानि धारयन्-अध्यतिष्ठत्) तदपि विचारयत यत् पुनर्लोकलोकान्तराणि धारयन् तदुपरि खल्वधितिष्ठति ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Which is that forest and which is that tree from which the divine forces of nature carve out and shape the heaven and earth? O sages and scholars of divine vision, with your heart and intelligence ask that omniscient lord who abides and presides over the worlds of all existence, holding and controlling them in order.