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वि॒श्वत॑श्चक्षुरु॒त वि॒श्वतो॑मुखो वि॒श्वतो॑बाहुरु॒त वि॒श्वत॑स्पात् । सं बा॒हुभ्यां॒ धम॑ति॒ सं पत॑त्रै॒र्द्यावा॒भूमी॑ ज॒नय॑न्दे॒व एक॑: ॥

English Transliteration

viśvataścakṣur uta viśvatomukho viśvatobāhur uta viśvataspāt | sam bāhubhyāṁ dhamati sam patatrair dyāvābhūmī janayan deva ekaḥ ||

Pad Path

वि॒श्वतः॑ऽचक्षुः । उ॒त । वि॒श्वतः॑ऽमुखः । वि॒श्वतः॑ऽबाहुः । उ॒त । वि॒श्वतः॑ऽपात् । सम् । बा॒हुऽभ्या॑म् । धम॑ति । सम् । पत॑त्रैः । द्यावा॒भूमी॒ इति॑ । ज॒नय॑न् । दे॒वः । एकः॑ ॥ १०.८१.३

Rigveda » Mandal:10» Sukta:81» Mantra:3 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:16» Mantra:3 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:3


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (विश्वतः-चक्षु) सर्वत्र व्याप्त नेत्र शक्तिवाला-सर्वद्रष्टा (उत) और (विश्वतः-मुखः) सर्वत्र व्याप्त मुख शक्तिवाला सब पदार्थों के ज्ञानकथन की शक्तिवाला (विश्वतः-बाहुः) सर्वत्र व्याप्त भुज शक्तिवाला-सर्वत्र पराक्रमी (उत) और (विश्वतः-पात्) सर्वत्र व्याप्त शक्तिवाला-विभु गतिमान् (एकः-देव) एक ही वह शासक परमात्मा (द्यावाभूमी जनयन्) द्युलोक पृथिवीलोक-समस्त जगत् को उत्पन्न करनेहेतु (बाहुभ्याम्) भुजाओं से-बल पराक्रमों से (पतत्रैः) पादशक्तियों से-ताडनशक्तियों से (संधमति) ब्रह्माण्ड को आन्दोलित करता है-हिलाता-झुलाता चलाता है ॥३॥
Connotation: - जितनी भी मनुष्य के अन्दर अङ्गों की शक्तियाँ होती हैं, वे एकदेशी हैं, परन्तु परमात्मा की दर्शनशक्ति, वक्तृशक्ति, भुजशक्ति, पादशक्ति ये व्यापक हैं, इसी से वह द्यावापृथिवीमय ब्रह्माण्ड को स्वाधीन करता हुआ यथायोग्य व्यापार करता है ॥३॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

वह सर्वव्यापक प्रभु स्वयं अधिष्ठान हैं

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के 'अधिष्ठान' के विषय में किये गये प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि वे प्रभु (विश्वतः चक्षुः) = सब ओर आँखोंवाले हैं, उत और विश्वतोमुखा सब ओर मुखोंवाले हैं । (विश्वतः बाहुः) = सब ओर भुजाओंवाले हैं, (उत) = और (विश्वतस्पात्) = सब ओर पाँवोंवाले हैं। [२] वे प्रभु (बाहुभ्याम्) = बाहुओं से संधमति द्युलोक को सम्यक् प्रेरित करते हैं और (पत्रैः) = पतनशील इन पाँवों से पृथिवी को (सम्) = [धमति] प्रेरित कर रहे हैं। इस प्रकार वे (एकः देवः) = किसी अन्य की सहायता की अपेक्षा न करते हुए अकेले प्रभु (द्यावाभूमी) = द्युलोक व पृथिवीलोक को (जनयन्) = उत्पन्न कर रहे हैं । [३] ये प्रभु सर्वव्यापक हैं। इनमें सर्वत्र देखनेवाले ग्रहण करने व चलने की शक्ति है । सब इन्द्रियों के गुणों की इनमें सर्वत्र प्रतीति है । परन्तु इन्द्रियों से ये रहित हैं। निराकार होने से ये बाह्य अधिष्ठान की अपेक्षा नहीं रखते। ये स्वयं सब के अधिष्ठान हैं, इनका कोई अधिष्ठान नहीं । इन से बाह्य कोई वस्तु ही नहीं जो इनका अधिष्ठान बने ।
Connotation: - भावार्थ- वे सर्वव्यापक प्रभु सर्वत्र सब इन्द्रियों के गुणों के आभासवाले हैं । सर्वव्यापक व निराकार होने से उनके बाह्य अधिष्ठान का न सम्भव है न आवश्यकता ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (विश्वतः-चक्षुः) सर्वतो व्याप्तनेत्रशक्तिमान् (उत) अपि (विश्वतः-मुखः) सर्वतो व्याप्तमुखशक्तिमान्-व्याप्तज्ञानवान् (विश्वतः-बाहुः) सर्वतो व्याप्तभुजशक्तिमान् (उत) अथ च (विश्वतः-पात्) सर्वतो व्याप्तपादशक्तिमान् सर्वत्र विभुगतिमान् (एकःदेवः) एक एव परमेश्वरो देवः (द्यवाभूमी जनयन्) द्युलोकं पृथिवीलोकं च द्यावापृथिवीमयं जगदुत्पादयन्-उत्पादनहेतो: (बाहुभ्यां पतत्रैः संधमति) भुजाभ्यामिव बलपराक्रमाभ्यां पादशक्तिभिश्च खगोलं ब्रह्माण्डं वाऽऽन्दोलयति ॥३॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - All watching with cosmic eyes, all speaking with cosmic voice, all protecting with cosmic arms and all sustaining on cosmic foundations, the sole self-refulgent maker creating heaven and earth shapes and controls the universe with his hands, i.e., thought and will with strokes of the natural forces forging things into form.