Word-Meaning: - [१] (ऋभवः) = [ऋतेन भाति ] ऋत से देदीप्यमान होनेवाले मेधावी पुरुष (अग्नये) = उस प्रभु के लिये (ब्रह्म ततक्षुः) = स्तोत्र को करते हैं । वस्तुतः प्रभु-स्तवन से ही वे 'ऋभु' बन पाते हैं। हम भी उस (महां अग्निम्) = उस महनीय अग्नि के लिये (सुवृक्तिम्) = दोषवर्जनरूप उत्तम स्तुति को (अवोचाम) = उच्चारण करते हैं । [२] हे (यविष्ठ) = हमारे दोषों को पृथक् करनेवाले तथा गुणों से हमें संपृक्त करनेवाले (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (जरितारम्) = अपने स्तोता को (प्राव) = आप प्रकर्षेण रक्षित करिये । हम आपका स्तवन करते हैं, आप हमें दोषों के आक्रमण से बचाते हैं । दोषों के आक्रमण से बचाने के लिये ही अग्ने हे अग्रेणी प्रभो ! आप (महि द्रविणम् )= महनीय धन को (आयजस्व) = हमारे साथ संगत करिये। हम उत्तम मार्ग से धन को कमाते हुए जीवनयात्रा को निर्दोष रूप से पूर्ण करनेवाले हों ।
Connotation: - भावार्थ - हम प्रभु का स्तवन करें, प्रभु हमारा रक्षण करें। इस रक्षण के लिये ही प्रभु हमें महनीय धन को प्राप्त करायें। सूक्त के प्रारम्भ में कहते हैं कि उपासित प्रभु हमें 'वीर - श्रुत्य-कर्मनिष्ठ' सन्तान प्राप्त कराते हैं । [१] प्रभु ही हमें बाह्य व अन्तः संग्रामों में विजयी बनाते हैं, [२] क्रियाशीलता के द्वारा हम वासनाओं में फँसने से बचें, [३] प्रभु हमें सब ऐश्वर्य प्राप्त कराते हैं, [४] उस प्रभु के हम ज्ञानी भक्त बनने का प्रयत्न करें, [५] प्रभु हमारे कल्याण के लिये हमें ज्ञान देते हैं, [६] हम प्रभु का स्तवन करेंगे, प्रभु हमारा रक्षण करेंगे, [७] वे प्रभु ही 'विश्वकर्मा' हैं, सृष्टिरूप कर्मवाले हैं। इसके उपासक हम भी ‘विश्वकर्मा' बनें, सदा क्रियाशील हों और भुवन का हित करनेवाले 'भौवन' बनें। ये ‘विष्वकर्मा भौवन' ही अगले दो सूक्तों के ऋषि हैं-