Word-Meaning: - [१] प्रभु ने यह भी एक विचित्र व्यवस्था की है मनुष्य अग्नि के लिये अन्न व घृत आदि की आहुति देता है और अग्नि पर्जन्य [= बादल] आदि के द्वारा वृष्टि कराता हुआ फिर से मनुष्य को अन्न प्राप्त कराता है और उसका पोषण करता है । इस प्रकार यह देवों व मनुष्यों का परस्पर भावन चलता है। (यः) = जो (अस्मै) इस अग्नि के लिये (अन्नम्) = अन्न को (तृषु) = शीघ्र (आदधाति) = स्थापित करता है और (घृतैः आज्यैः) = [घृ दीप्तौ ] दीप्त घृतों से (जुहोति) = आहुत करता है अग्रि उसका (पुष्यति) = पोषण करता है, (तस्मै) = उसके लिये (सहस्त्रं अक्षभिः) = हजारों आँखों से (विचक्षे) = [विपश्यति looks after] ध्यान करता है, अर्थात् उसके रक्षण के लिये सदा अप्रमत्त रहता है। [२] इस प्रकार उस प्रभु ने मनुष्य के पालन के लिये यह अद्भुत ही व्यवस्था की है। यही क्या, वास्तव में जिधर ही देखें उसी तरफ प्रभु की इस प्रकार की व्यवस्थाएँ दृष्टिगोचर होती हैं कि सर्वत्र उसकी महिमा दिखने लगती है। हे (अग्ने) = परमात्मन् ! (त्वम्) = आप (विश्वतः) = सब ओर (प्रत्यङ्) = [प्रत्यगचनः ] अभिमुख गति करते हुए (असि) = हैं, सब ओर हमारी अनुकूलता से आप प्रवर्तमान हो रहे हैं। जिधर दृष्टि जाती है उधर ही आपकी महिमा दिखती है।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु ने यह भी विचित्र व्यवस्था की है कि मनुष्य यज्ञादि में अग्नि में अन्न व घृत को आहुत करता है और अग्नि, बादल वृष्टि व अन्नादि की उत्पत्ति के क्रम से मनुष्य का पोषण करता है।