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तद्वा॑मृ॒तं रो॑दसी॒ प्र ब्र॑वीमि॒ जाय॑मानो मा॒तरा॒ गर्भो॑ अत्ति । नाहं दे॒वस्य॒ मर्त्य॑श्चिकेता॒ग्निर॒ङ्ग विचे॑ता॒: स प्रचे॑ताः ॥

English Transliteration

tad vām ṛtaṁ rodasī pra bravīmi jāyamāno mātarā garbho atti | nāhaṁ devasya martyaś ciketāgnir aṅga vicetāḥ sa pracetāḥ ||

Pad Path

तत् । वा॒म् । ऋ॒तम् । रो॒द॒सी॒ इति॑ । प्र । ब्र॒वी॒मि॒ । जाय॑मानः । मा॒तरा॑ । गर्भः॑ । अ॒त्ति॒ । न । अ॒हम् । दे॒वस्य॑ । मर्त्यः॑ । चि॒के॒त॒ । अ॒ग्निः । अ॒ङ्ग । विऽचे॑ताः । सः । प्रऽचे॑ताः ॥ १०.७९.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:79» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:14» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:4


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (रोदसी मातरा) हे पापों के रोध-निरोध निवारण करनेवाले माता-पिताओं ! (वाम्) तुम दोनों के (तत्-ऋतं प्रब्रवीमि) उस सत्य व्यवहार को मैं कहता हूँ, कि (जायमानः-गर्भः-अत्ति) उत्पन्न होनेवाला गर्भरूप बालक तुम दोनों को खाता है, तुम दोनों से आहार ग्रहण करता है, (अहम्-अग्निः-मर्त्यः) मैं शरीर का नेता जीवात्मा (देवस्य न चिकेत) जन्मदाता परमात्मा के स्वरूप को नहीं जानता (अङ्ग विचेताः स प्रचेताः) वह विशेष चेतानेवाला तथा प्रकृष्ट चेतानेवाला है ॥४॥
Connotation: - माता-पिता बालक को अनेक दोषों से बचावें या बचाया करते हैं। बालक जन्म से ही माता-पिता के अङ्गों से बढ़ता है तथा उत्पन्न करनेवाला परमात्मा उसे विशेष सावधान करता है संसार में रहने के लिए तथा प्रकृष्टरूप में प्रबुद्ध करता है मोक्षप्राप्ति के लिए। वह उसे भी नहीं जानता है। उसे जानना और मानना चाहिए, इसी में कल्याण है ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

प्रभु की अचिन्त्य महिमा

Word-Meaning: - [१] हे (रोदसी) = द्यावापृथिवी में (वाम्) = आपके (तद् ऋतम्) = उस ऋत को (प्रब्रवीमि) = प्रकर्षेण उच्चारण करता हूँ । आपके अन्दर होनेवाली प्रत्येक क्रिया बड़े ऋत के साथ हो रही है । ऋत का अभिप्राय है प्रत्येक क्रिया का ठीक समय पर व ठीक स्थान पर होना । प्रत्येक नक्षत्र एकदम नियमित गति से चल रहा है। इस सृष्टि के किसी भी पिण्ड में नाममात्र भी अमृत का स्थान नहीं है । यह ऋत भी उस प्रभु की महिमा को व्यक्त कर रहा है । [२] यह भी एक अद्भुत ही बात है कि (जायमानः गर्भः) = विकसित होता हुआ गर्भ (मातरा) = अपने जन्म देनेवाले माता-पिता को ही अत्ति-खा जाता है। एक बालक का शरीर माता-पिता की शक्ति के व्यय से ही बनता है। बालक बढ़ता है, माता-पिता क्षीण होते हैं । यह भी वस्तुतः एक विचत्र ही व्यवस्था है । [३] इस सारी व्यवस्था का विचार करता हुआ (अहं मर्त्यः) = मैं मरणधर्मा तो (देवस्य) = उस देव की महिमा को (नचिकेत) = पूरा-पूरा नहीं समझ पाता हूँ। हे अंग- हे प्रिय ! (अग्निः) = वह सबका अग्रेणी प्रभु ही (विचेताः) = विविध ज्ञानोंवाला है, इन सब विविध व्यवस्थाओं के मर्म को वही जानता है (स प्रचेताः) = वही प्रकृष्ट ज्ञानी है। प्रभु ही अपनी महिमा को पूर्णरूपेण जानते हैं ।
Connotation: - भावार्थ - इस द्युलोक व पृथ्वीलोक में कार्य करता हुआ 'ऋत' प्रभु की महिमा को प्रकट करता है, यह भी एक विचित्र बात है कि जायमान गर्भ अपने ही माता-पिता को क्षीण करनेवाला होता है ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (रोदसी मातरा) हे रोधसी-पापाद्रोधयितुमानिरोधयित्र्यौ मातापितरौ ! (वाम्) युवयोः (तत्-ऋतं प्र ब्रवीमि) तं सत्यव्यवहारं प्रकथयामि (जायमानः-गर्भः-अत्ति) जनिष्यमाणो गर्भभूतो बालो युवां खादति युवाभ्यामेवाहारं गृह्णाति (अहम्-अग्निः-मर्त्यः-देवस्य न चिकेत) अहं शरीरनेता जीवात्मा जन्मदातुः परमात्मनः स्वरूपं न वेद (अङ्ग विचेताः स प्रचेताः) अरे स यो विशिष्टतया चेतयिता प्रचेतयिता ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O heaven and earth, father and mother of life in existence, truly do I speak to you of that law of life which you observe and sustain: the baby life in the womb and, thereafter, receives its sustenance from father and mother. I, the rising vital form, the mortal, know not of the lord divine. For sure, Agni the omniscient alone knows all, Agni alone illuminates the spirit in the human form.