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य उ॒दृचि॑ य॒ज्ञे अ॑ध्वरे॒ष्ठा म॒रुद्भ्यो॒ न मानु॑षो॒ ददा॑शत् । रे॒वत्स वयो॑ दधते सु॒वीरं॒ स दे॒वाना॒मपि॑ गोपी॒थे अ॑स्तु ॥

English Transliteration

ya udṛci yajñe adhvareṣṭhā marudbhyo na mānuṣo dadāśat | revat sa vayo dadhate suvīraṁ sa devānām api gopīthe astu ||

Pad Path

यः । उ॒त्ऽऋचि॑ । य॒ज्ञे । अ॒ध्व॒रे॒ऽस्थाः । म॒रुत्ऽभ्यः॑ । न । मानु॑षः । ददा॑शत् । रे॒वत् । सः । वयः॑ । द॒ध॒ते॒ । सु॒ऽवीर॑म् । सः । दे॒वाना॑म् । अपि॑ । गो॒ऽपी॒थे । अ॒स्तु॒ ॥ १०.७७.७

Rigveda » Mandal:10» Sukta:77» Mantra:7 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:11» Mantra:2 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:7


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः) जो (अध्वरेष्ठाः) अध्यात्म मार्गवाले योग में स्थित (मानुषः) मनुष्य तथा (उदृचि) उत्कृष्ट स्तुतिवाले ज्ञानयज्ञ के निमित्त (मरुद्भ्यः) जीवन्मुक्तों के लिए (न) सम्प्रति (ददाशत्) अपने आत्मा को दे देता है, समर्पित करता है, (सः) वह (सुवीरम्) शोभन प्राणों से युक्त (रेवत्) मोक्षैश्वर्यवाले (वयः) जीवन को (दधते) धारण करता है, तथा (सः) वह (गोपीथे) सोमपान-शान्त परमानन्दरसपान के निमित्त (देवानाम्-अस्तु) जीवन्मुक्तों के मध्य में-उनकी श्रेणी में हो जाता है ॥७॥
Connotation: - अध्यात्ममार्गवाले योगाभ्यास तथा परमात्मा की स्तुति के निमित्त मनुष्य जीवन्मुक्त विद्वानों की संगति से मोक्षानन्द पान करने का अधिकारी उत्कृष्ट जीवनवाला बन जाता है ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

यज्ञशीलता व प्राणायाम

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो व्यक्ति (उदृचि) = उद्गत ऋचाओंवाले, जिसमें ऋचाओं का, मन्त्रों का उच्चारण हो रहा है ऐसे (यज्ञे) = यज्ञ में (अध्वरेष्ठाः) = हिंसारहित कर्मों में स्थित होनेवाला बनता है, अर्थात् जो यज्ञों में प्रवृत्त रहता है (न) = और [न इति चार्थे] (मानुषः) = विचारशील बनकर (मरुद्भ्यः) = प्राणों के लिये (ददाशत्) = अपने को दे डालता है, अर्थात् प्राणसाधना में प्रवृत्त होता है, (स) = वह (वयः) = उत्तम आयुष्य को दधते धारण करता है। उस आयुष्य को जो (रेवत्) = उत्तम ज्ञान के धनवाला है और (सुवीरम्) = उत्तम वीरता से सम्पन्न है। [२] (स) = वह यज्ञशील प्राणसाधक पुरुष (देवानाम्) = देवों के (गोपीथे) = [गोपीथ protection] रक्षण में (अपि) = भी (अस्तु) = हो । सब देव इसके अनुकूल होते हैं और यह उत्तरोत्तर उन्नति करता हुआ दिव्यता का अपने में वर्धन करता है ।
Connotation: - भावार्थ - यज्ञशीलता व प्राणसाधना मनुष्य को ज्ञानधन, वीरता व दिव्यता प्राप्त कराती हैं।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (यः-अध्वरेष्ठाः-मानुषः) योऽध्यात्ममार्गवति योगसमाधौ स्थितो जनः (उदृचि) उत्कृष्टस्तुतिमति यज्ञे-ज्ञानयज्ञे (न ददाशत्) सम्प्रति स्वात्मानं ददाति (मरुद्भ्यः-सुवीरम्-रेवत्-वयः-दधते) स शोभनप्राणयुक्तं मोक्षैश्वर्य्यवज्जीवनं धारयति “दध धारणे” [भ्वादि] तथा (सः-गोपीथे-देवानाम्-अस्तु) स खलु सोमपाने “गोपीथाय सोमपानाय” [निरु० १०।३६] शान्तपरमानन्दरस-पाने जीवन्मुक्तानां मध्ये भवतु ॥७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The man established in Vedic chant and yajnic programmes of creation and development who gives for yajna and also gives to the brilliant and versatile Maruts achieves good health and long age blest with plenty of wealth and noble children and he also enjoys the protection of divinities on the path of rectitude.