Word-Meaning: - [१] हे (मरुतः) = प्राणो ! (यूयम्) = तुम (यद्) = जब (पराकाद्) = दूर देश से (वहध्वे) = इन्द्रियों व मन को (पुनः) = वापिस लाते हो, भटकते हुए इनको निरुद्ध करके अन्दर ही स्थापित करते हो तो आप (महः) = महनीय, प्रशंसनीय, (संवरणस्य) = वरणीय, चाहने योग्य (वस्वः) = आत्म-धन के (विदानासः) = प्राप्त करानेवाले होते हो, उस आत्मधन के जो (राध्यस्य) = सिद्ध करने योग्य है, सचमुच प्राप्त करने योग्य है । इस आत्मधन के अभाव में अन्य धनों को तो कोई महत्त्व है ही नहीं । प्राणसाधना के होने पर चित्तवृत्ति निरोध सम्भव होता है, उस समय आत्मदर्शन से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। यह आत्मदर्शन ही राध्य व साध्य है । [२] (वसवः) = आत्मदर्शन के द्वारा उत्तम निवास को प्राप्त करानेवाले वसुओ ! आप (सनुतः) = अन्तर्हित (द्वेषः) = द्वेष की भानाओं को [ द्वेषः = द्वेष्टन् सा० ] (आरात् चित्) = सुदूर ही (युयोत) = हमारे से पृथक् करो । आत्मदर्शन के होने पर द्वेष की भावनाओं के रहने का सम्भव ही नहीं रहता। ये अवाञ्छनीय भावनाएँ हमारे हृदयों में छिपे रूप से विद्यमान होती हैं, इन्हें नष्ट करना आवश्यक ही है। इनके नाश के लिये यह प्राणसाधना साधन बनती है ।
Connotation: - भावार्थ - प्राणायाम से चित्तवृत्ति का निरोध होकर आत्मदर्शन रूप महनीय धन प्राप्त होता है, उस समय मन में द्वेष की भावनाओं का अभाव हो जाता है ।