राक्षसी वृत्तियों को संहार
Word-Meaning: - [१] प्रभु उपासकों से कहते हैं कि - हें (अद्रय:) = [thrse who adone] उपासको ! (भंगुरावतः) = भंजन व तोड़-फोड़ के कर्मों में प्रवृत्त होनेवाली (रक्षसः) = राक्षसी वृत्तियों को (अपहृत) = अपने से सुदूर विनष्ट करो, (निर्ऋतिम्) = दुर्गति-दुराचरण-रूप पापदेवता को (स्कभायत) = दूर ही रोक दो, (अमतिम्) = अप्रशस्त बुद्धि को (सेधत) = अपने समीप आने से निषिद्ध कर दो वस्तुतः प्रभु का उपासक राक्षसीवृत्तियों से, पाप से अप्रशस्त विचारों से अपने को दूर ही रखता है। [२] हे उपासको ! (नः) = हमारे इस (सर्ववीरम्) = सारे कोशों को वीरता से पूर्ण करनेवाले (रयिम्) = सोमात्मक धन को (सुनोतन) = अपने में अभिषुत करो। इस सोम के रक्षण से ही तुम राक्षसी वृत्तियों को, निर्ऋति व अमति को दूर रख पाओगे। इस सोम के रक्षण के लिये ही (देवाव्यम्) = दिव्यगुणों के प्रीणित करनेवाले (श्लोकम्) = प्रभु के यशोगान को (भरत) = धारण करनेवाले बनो। प्रभु का यह स्तवन वासनाओं से बचाकर सोमरक्षण के लिये सहायक होगा और हमारे में दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाला होगा ।
Connotation: - भावार्थ- हम उपासक बनकर सोम का रक्षण करें। यह सोमरक्षण हमें अशुभ वृत्तियों से बचायेगा और शुभ की ओर ले चलेगा ।