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अप॑ हत र॒क्षसो॑ भङ्गु॒राव॑त स्कभा॒यत॒ निॠ॑तिं॒ सेध॒ताम॑तिम् । आ नो॑ र॒यिं सर्व॑वीरं सुनोतन देवा॒व्यं॑ भरत॒ श्लोक॑मद्रयः ॥

English Transliteration

apa hata rakṣaso bhaṅgurāvata skabhāyata nirṛtiṁ sedhatāmatim | ā no rayiṁ sarvavīraṁ sunotana devāvyam bharata ślokam adrayaḥ ||

Pad Path

अप॑ । ह॒त॒ । र॒क्षसः॑ । भ॒ङ्गु॒रऽव॑तः । स्क॒भा॒यत॑ । निःऽऋ॑तिम् । सेध॑त । अम॑तिम् । आ । नः॒ । र॒यिम् । सर्व॑ऽवीरम् । सु॒नो॒त॒न॒ । दे॒व॒ऽअ॒व्य॑म् । भ॒र॒त॒ । श्लोक॑म् । अ॒द्र॒यः॒ ॥ १०.७६.४

Rigveda » Mandal:10» Sukta:76» Mantra:4 | Ashtak:8» Adhyay:3» Varga:8» Mantra:4 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:4


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अद्रयः) हे मन्त्रोपदेश करनेवाले विद्वानों ! तुम (भङ्गुरावतः) प्रहारक प्रवृत्तिवाले (रक्षसः) दुष्ट विचारों को (अपहत) नष्ट करो (निर्ऋतिं स्कभायत) रमणतारहित या अरमणीय प्रवृत्ति को नियन्त्रित करो-रोको (अमतिम्-अपसेधत) अज्ञता को दूर करो (नः) हमारे लिए (सर्ववीरं रयिम्) समस्त प्राणों से युक्त पोषण को (आसुनोतन) सम्पादित करो (देवाव्यं श्लोकं-भरत) परमात्मदेव जिससे प्राप्त हो, ऐसे वचन को हमारे अन्दर धारण करो ॥४॥
Connotation: - विद्वान् जन जनता को ऐसा उपदेश करें, जिससे कि उनके अन्दर से दुष्ट विचार, अस्थिरता, अज्ञान दूर होकर वे स्वास्थ्य और परमात्मा की प्राप्ति कर सकें ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

राक्षसी वृत्तियों को संहार

Word-Meaning: - [१] प्रभु उपासकों से कहते हैं कि - हें (अद्रय:) = [thrse who adone] उपासको ! (भंगुरावतः) = भंजन व तोड़-फोड़ के कर्मों में प्रवृत्त होनेवाली (रक्षसः) = राक्षसी वृत्तियों को (अपहृत) = अपने से सुदूर विनष्ट करो, (निर्ऋतिम्) = दुर्गति-दुराचरण-रूप पापदेवता को (स्कभायत) = दूर ही रोक दो, (अमतिम्) = अप्रशस्त बुद्धि को (सेधत) = अपने समीप आने से निषिद्ध कर दो वस्तुतः प्रभु का उपासक राक्षसीवृत्तियों से, पाप से अप्रशस्त विचारों से अपने को दूर ही रखता है। [२] हे उपासको ! (नः) = हमारे इस (सर्ववीरम्) = सारे कोशों को वीरता से पूर्ण करनेवाले (रयिम्) = सोमात्मक धन को (सुनोतन) = अपने में अभिषुत करो। इस सोम के रक्षण से ही तुम राक्षसी वृत्तियों को, निर्ऋति व अमति को दूर रख पाओगे। इस सोम के रक्षण के लिये ही (देवाव्यम्) = दिव्यगुणों के प्रीणित करनेवाले (श्लोकम्) = प्रभु के यशोगान को (भरत) = धारण करनेवाले बनो। प्रभु का यह स्तवन वासनाओं से बचाकर सोमरक्षण के लिये सहायक होगा और हमारे में दिव्यगुणों का वर्धन करनेवाला होगा ।
Connotation: - भावार्थ- हम उपासक बनकर सोम का रक्षण करें। यह सोमरक्षण हमें अशुभ वृत्तियों से बचायेगा और शुभ की ओर ले चलेगा ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (अद्रयः-भङ्गुरावतः-रक्षतः-अपहत) हे मन्त्रोपदेष्टारः ! प्रहारकप्रवृत्तिमतो दुष्टान् विचारान्  नाशयत (निर्ऋतिं स्कभायत) नीरमणीयां प्रवृत्तिं स्तम्भयत-नियन्त्रयत (अमतिम्-अपसेधत) अज्ञतां दूरी कुरुत (नः-सर्ववीरं-रयिम्-आसुनोतन) अस्मभ्यं सर्वप्राणयुक्तम् “प्राणा वै दशवीराः” [श० १२।८।१।२३] पोषं पोषणम् “रयिं देहि पोषं देहि” [काठ० १।७] सम्पादयत (देवाव्यं श्लोकं भरत) परमात्मदेवः प्राप्यो येन भवति तथाविधं वचनमस्मासु धारयत ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O yajakas and creators of soma, destroy the wicked and the evil tendencies, hold off the crooked and negative forces from the ways of development and progress, drive off want and poverty, create and bring us wealth and progeny worthy of the brave, and sing songs of thanks and praise in honour of the divinities.