'सुसंरब्ध' देव तथा उल्कापात
Word-Meaning: - [१] (यद्) = जो (देवाः) = प्रकृति से उत्पन्न हुए हुए ये दिव्य लोक-लोकान्तर हैं, वे सब (अदः सलिले) = उस महान् अन्तरिक्ष में [ सलिले = अन्तरिक्षे ७ । ४९ । १ द०] (सुसंरब्धा:) = बहुत अच्छी प्रकार आपस में जुड़े हुए [cloudly joined] न असम्बद्ध रूप में (अतिष्ठत) = अपनी-अपनी मर्यादा में स्थित हैं । जैसे फूल अलग-अलग होते हुए भी एक माला में पिरोये हुए होते हैं, उसी प्रकार ये लोक-लोकान्तर अलग-अलग होते हुए भी प्रभु रूप सूत्र में पिरोये हुए हैं। ब्रह्माण्ड के अवयवभूत ये लोक-लोकान्तर अलग-अलग होते हुए भी मिलकर एक ब्रह्माण्ड की इकाई को बनाते हैं । सब पिण्ड अव्यवस्थित न होकर एक व्यवस्था में चल रहे हैं, इसी से ये कहीं टकराते नहीं। अपनी-अपनी मर्यादा में स्थित हुए हुए अपने मार्ग का आक्रमण कर रहे हैं। [२] (अत्रा) = इस विशाल अन्तरिक्ष में (नृत्यतां इव) = नृत्य-सा करते हुए (वः) = इन सब पिण्डों का (तीव्रः रेणुः) = अन्य सारे पिण्ड की अपेक्षा कुछ तीव्र गति में हुआ हुआ शिथिल भाग [रेणु] (अप अयत) = उस पिण्ड दूर किसी ओर पिण्ड की ओर चला जाता है। इसे ही व्यवहार में उल्कापात कहते हैं। आकाश में तारे नृत्य-सा करते हुए प्रतीत होते हैं, उनका टिमटिमाना ऐसा ही लगता है। इन तारों का पृथ्वी की धूल की तरह जो शिथिल भाग होता है, वह कभी-कभी समीप से गति करते हुए किसी और पिण्ड की ओर चला जाता है। साधारण लोग इसे 'तारा टूटना' कह देते हैं । इन उल्कापातों से अन्य पिण्डों की रचना का ज्ञान होने में बहुत कुछ सहायता मिलती है ।
Connotation: - भावार्थ - आकाश में वर्तमान ये सब पिण्ड अलग-अलग होते हुए भी परस्पर व्यवस्था में सम्बद्ध हैं। कभी-कभी इनका कोई शिथिल भाग तीव्र गति होकर दूसरे पिण्ड की ओर चला जाता है ।