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दि॒वो वा॒ सानु॑ स्पृ॒शता॒ वरी॑यः पृथि॒व्या वा॒ मात्र॑या॒ वि श्र॑यध्वम् । उ॒श॒तीर्द्वा॑रो महि॒ना म॒हद्भि॑र्दे॒वं रथं॑ रथ॒युर्धा॑रयध्वम् ॥

English Transliteration

divo vā sānu spṛśatā varīyaḥ pṛthivyā vā mātrayā vi śrayadhvam | uśatīr dvāro mahinā mahadbhir devaṁ rathaṁ rathayur dhārayadhvam ||

Pad Path

दि॒वः । वा॒ । सानु॑ । स्पृ॒शत॑ । वरी॑यः । पृ॒थि॒व्या । वा॒ । मात्र॑या । वि । श्र॒य॒ध्व॒म् । उ॒श॒तीः । द्वा॒रः॒ । म॒हि॒ना । म॒हत्ऽभिः॑ । दे॒वम् । रथ॑म् । र॒थ॒ऽयुः । धा॒र॒य॒ध्व॒म् ॥ १०.७०.५

Rigveda » Mandal:10» Sukta:70» Mantra:5 | Ashtak:8» Adhyay:2» Varga:21» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:6» Mantra:5


BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (द्वारः) हे द्वार के समान सुशोभित गृहदेवियों-गृहमहिलाओं ! अथवा इन्द्रियद्वारों से निकली हुई शुभवृत्तियों ! (दिवः-वा सानु स्पृशत) मोक्ष-धाम के-स्वर्ग के भजनीय सुख को प्राप्त करो (पृथिव्याः-वा वरीयः) प्रथित सृष्टि के महत्तर सुख को (मात्रया विश्रयध्वम्) आंशिकरूप से सेवन करो (उशतीः) कामना करती हुई (महिना महद्भिः) गुणमहत्त्व से महान् विद्वानों से स्वीकृत तथा अनुमोदित (देवं रथं रथयुः-धारयध्वम्) रमणीय मोक्ष या गृहस्थ के रमण को चाहते हुए धारण करो ॥५॥
Connotation: - घर की महिलाएँ अथवा प्रत्येक मनुष्य की इन्द्रियवृत्तियाँ सृष्टि के भोगों को आंशिकरूप में भोगें। इसी में कल्याण है, अधिक सेवन में नहीं। तथा महान् विद्वानों द्वारा सेवित तथा अनुमोदित विशेषरूप से मोक्षधाम का सुख, साधारणरूप से गृहस्थ का सुख भोगने योग्य है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

द्वार:-इन्द्रियाणिं

Word-Meaning: - [१] 'अष्टचक्रा नवद्वारा०' आदि मन्त्रभागों में द्वार् शब्द इन्द्रियों के लिये प्रयुक्त हुआ है। इन इन्द्रियों के दो मुख्य विभाग हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ । ज्ञानेन्द्रियों के लिये प्रार्थना करते हैं कि हे ज्ञानेन्द्रियरूप द्वारो! (दिवः) = ज्ञान के (वरीयः) = विशाल व उत्कृष्ट (सानु) = शिखर को (स्पृशता) = तुम छूनेवाले बनो। अर्थात् ऊँचे से ऊँचे ज्ञान को प्राप्त करनेवाले होओ। हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्ति का साधन बनें। [२] (वा) = और हे कर्मेन्द्रिय रूप द्वारो ! तुम (पृथिव्याः मात्रया) = पृथिवी की मात्रा से, अर्थात् पृथिवी को इकाई बनाकर, सारी पृथिवी को ही अपना कुटुम्ब समझकर, (वि श्रयध्वम्) = विशेषरूप से लोकहितात्मक कर्मों का सेवन करनेवाले बनो । अर्थात् तुम्हारे सब कार्य हृदय की विशाल वृत्ति से किये जाएँ, स्वार्थ से ऊपर उठकर ही सब कार्य हों। [३] (उशती:) = हित की कामनावाले (द्वार:) = इन्द्रिय द्वारो ! (महिना महद्भिः) = महिमा से महान् देवों से अधिष्ठित और अतएव (देवं रथम्) = इस प्रकाशमय रथ को (रथयुः) = रथ की कामनावाले होकर (धारयध्वम्) = धारण करो। इस शरीर-रथ में सब देव आरुढ़ हैं, 'सर्वाह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते'। सूर्य यहाँ आँखों में स्थित है, तो दिशाएँ कानों में, वायु नासिका में, अग्नि मुख में, चन्द्रमा मन में, पृथिवी पाँवों में और इसी प्रकार अन्यान्य देवता अन्यान्य स्थानों में स्थित हैं। सब देवों का अधिष्ठान होने से यह शरीर - रथ 'देवरथ' है । इस देवरथ को ये सब इन्द्रिय द्वार उत्तमता से धारण करते हैं। सब इन्द्रिय द्वारों [ख] का उत्तम होना [सु] ही 'सुख' है। इनकी विकृति [दुः] ही 'दुःख' है । शरीर के ये सब द्वार ठीक होंगे तभी ज्ञान के शिखर पर भी हम पहुँचेंगे और तभी व्यापक लोकहित के कार्यों को कर सकेंगे।
Connotation: - भावार्थ - हमारे सब इन्द्रिय द्वार ठीक हों । ज्ञानेन्द्रियाँ हमें ज्ञानशिखर पर पहुँचाएँ और कर्मेन्द्रियाँ व्यापक यज्ञात्मक कर्मों में व्यापृत रहें ।

BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (द्वारः) हे द्वार इव सुशोभिता देव्यः ! “द्वारः द्वार इव सुशोभिताः” [ऋ० १।४२।६ दयानन्दः] इन्द्रियद्वारतो निःसृताः शुभो वृत्तयो वा (दिवः-वा सानु स्पृशत) मोक्षधाम्नः स्वर्गस्य भजनीयं सुखं प्राप्नुत (पृथिव्याः-वा वरीयः) प्रथितायाः सृष्टेश्च महत्तरं सुखम् (मात्रया विश्रयध्वम्) आंशिकरूपेण विश्रयत (उशतीः) कामयमानाः सत्यः (महिना महद्भिः-देवं रथं रथयुः-धारयध्वम्) गुणमहत्त्वेन महद्भिर्विद्वद्भिः स्वीकृतमनुमोदितं वा दिव्यं रमणीयं मोक्षं गार्हस्थ्यं वा रमणं कामयमानाः-धारयत ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O divinities of yajnic energy of nature, treasure troves of prosperity, touch the highest top of heavenly light and open and expand the fertility of earth in ample measure. Loving, passionate and gracious, ride the cosmic chariot of Infinity with the great divinities by virtue of your own grandeur and open the doors of boundless prosperity and enlightenment for humanity.