[ अध्वर का जार ] प्रेय + श्रेय
Word-Meaning: - गतमन्त्र के सात्त्विक अन्नों का सेवन करनेवाले व्यक्ति (आयव:) = [ एति ] गतिशील पुरुष (अग्निं) = उस अग्रेणी प्रभु को (अजनन्त) = अपने हृदयों में प्रादुर्भूत करते हैं और उन पवित्र हृदयों में (न्यसादयन्त) = इस प्रभु को बिठाते हैं, जो प्रभु (द्युभिः हितम्) = ज्ञान की ज्योतियों से स्थापित किया जाता है। अर्थात् प्रभु का प्रकाश बुद्धि की सूक्ष्मता का संपादन करके ज्ञान के वर्धन से ही होता है । (मित्रम् इव प्रयोगम्) = वे प्रभु सदा सच्चे स्नेही की तरह प्रकृष्ट मेल वाले हैं। मित्रता का उत्कर्ष स्वार्थ की क्षीणता के अनुपात में होता है। प्रभु का स्वार्थ क्योंकि शून्य है, तो प्रभु की मित्रता पूर्ण है। प्रभु की मित्रता में कभी टूट जाने का भय नहीं । वे प्रभु प्रत्नम् (ऋत्विजम्) = सनातन ऋत्विज हैं। उस उस ऋतु में ऋतु के अनुकूल पदार्थों का हमारे साथ संगतिकरण करनेवाले हैं। (अध्वरस्य जारम्) = हमारे से किये जानेवाले हिंसा शून्य लोकहितकारी यज्ञात्मक कर्मों के [समापयितारम्] अन्त तक पहुँचानेवाले हैं। प्रभु कृपा से ही सब यज्ञ पूर्ण हुआ करते हैं । (विक्षु होतारम्) = प्रजाओं में सब आवश्यक पदार्थों के प्राप्त करानेवाले हैं प्रभु ही संसार के सब पदार्थों का हमारी उन्नति के लिये निर्माण करते हैं। इस प्रभु को (आयवः) = प्रगतिशील पुरुष अपने हृदयों में प्रकाशित व स्थापित करते हैं। किस प्रकार ? (बाहुभ्याम्) = प्रयत्नों से वह द्विवचन का प्रयोग यह संकेत कर रहा है कि हमारे प्रयत्न केवल शारीरिक उन्नति के लिये न होकर बौद्धिक उन्नति के लिये भी हों। ये प्रयत्न प्रेय व श्रेय दोनों के साधक हों, इनमें इहलोक व परलोक दोनों का स्थान हो, ये अभ्युदाय व निःश्रेयस दोनों की प्राप्ति के लिए हों। हमारे प्रयत्न प्रकृति व परमात्मा को दोनों को प्राप्त करने के दृष्टिकोण से हो। उनमें प्रकृति विद्या व आत्मविद्या दोनों का स्थान हो । वे व्यक्तिवाद व समाजवाद दोनों दृष्टिकोणों से किये जाएँ ।
Connotation: - भावार्थ-वे प्रभु ज्ञान के प्रकाश में दिखते हैं, सच्चे मित्र हैं, सनातन काल से सब कुछ दे रहे हैं, हमारे यज्ञों को पूर्ण करनेवाले हैं। प्रजाओं को सब कुछ देनेवाले हैं। इन प्रभु को प्राप्त करने के लिये हमें प्रेय व श्रेय दोनों के लिए प्रत्नशील होना है ।