Word-Meaning: - [१] (अयं अग्नि:) = यह प्रगतिशील जीव (दीर्घतन्तुः) = विस्तृत यज्ञरूप कर्मतन्तुवाला होता है, अर्थात् इसके यज्ञों का तार कभी टूटता नहीं । बृहद् उक्षा यह बड़ा सेचन करनेवाला बनता है। शरीर में भोजन से उत्पन्न सोमशक्ति को शरीर में ही सिक्त करता है, इसे नष्ट नहीं होने देता। शरीर में सिक्त हुई हुई यह शक्ति शरीर की वृद्धि का कारण बनती है । [२] बढ़ी हुई शक्तिवाला यह (अग्निं सहस्त्रस्तरी:) = हजारों को आच्छादित करनेवाला होता है, शतश: पुरुषों का रक्षण करनेवाला होता है। (शतनीतः) = सौ के सौ वर्ष तक सदा इस उत्तम मार्ग से अपने को ले चलता है और इस प्रकार (ऋभ्वा) = महान् बनता है अथवा 'उरुभाति' खूब देदीप्यमान होता है । (द्युमत्सु) = ज्योतिर्मय पुरुषों में भी (द्युमान्) = खूब प्रशस्त ज्योतिवाला होता है । [३] इसके ज्योतिर्मय बनने का रहस्य इस बात में है कि यह (नृभिः) = उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले 'माता, पिता, आचार्य' आदि से (मृज्यमान:) खूब शुद्ध किया जाता है। माता इसे चरित्रवान् बनाती है, तो पिता इसे शिष्टाचार की शिक्षा देते हैं और आचार्य इसे ज्ञान ज्योति से परिपूर्ण करने के लिये यत्नशील होते हैं। इस प्रकार इन सब से शुद्ध जीवनवाला बनाया जाता हुआ यह (सुमित्रेषु) = अपने को रोगों व पापों से बचानेवाले (देवयत्सु) = उस महान् देव प्रभु को प्राप्त करने की कामनावालों में भी यह (दीदयः) = विशिष्ट रूप से दीप्त होता है। 'सुमित्र' व 'देवयन्' पुरुषों में भी इसका स्थान विशिष्ट होता है ।
Connotation: - भावार्थ- माता, पिता व आचार्य से शुद्ध किये गये जीवनवाले हम 'चरित्र, शिष्टाचार व ज्ञान' से सम्पन्न होकर, श्रेष्ठ पुरुषों में भी श्रेष्ठ बनें, हमारा जीवन चमक उठे ।