इन्द्र-अदिति-रुद्र-त्वष्टा
Word-Meaning: - [१] (इन्द्रः) = सर्वशक्तिमान्, सब शक्ति के कार्यों को करनेवाला प्रभु (वसुभिः) = निवास के लिये आवश्यक तत्त्वों के द्वारा (नः) = हमारे (गयम्) = शरीर गृह को (परिपातु) = रक्षित करे। हमें निवास के लिये सब आवश्यक तत्त्व प्राप्त रहें जिससे इस शरीर रूप घर में किसी प्रकार की कमी न आ जाये। [२] (अदितिः) = अदीना देवमाता (आदित्यैः) = सब देवों के साथ (नः) = हमारे लिये (शर्म) = सुख को (यच्छतु) = दे। हमारे जीवन में अदीनता हो और अदीनता के साथ सब दिव्यगुणों का निवास हो । वस्तुतः यही सुखमयी स्थिति है । [३] (रुद्रः) = [रोरूयमाणो द्रवति] गर्जना करता हुआ, वेदज्ञान का उपदेश देता हुआ [तिस्रो वाच उदीरते हरिरेति कनिक्रदत्] हमारी वासनाओं पर आक्रमण करता है इसलिए प्रभु 'रुद्र' कहलाते हैं। ये (रुद्र देवः) = प्रभु (रुद्रेभिः) = प्राणों के द्वारा (नः मृडयाति) = हमें सुखी करते हैं। 'प्राणों पर टकराकर वासनाएँ चकनाचूर हो जाती हैं' सो प्राण भी रुद्र कहलाते हैं। [४] इन वासनाओं के नष्ट हो जाने पर (त्वष्टा) = वे ज्ञान से दीप्त प्रभु (ग्नाभिः) = इन छन्दोरूप वेदवाणियों के द्वारा (नः) = हमें (सुविताय) = उत्तम मार्ग पर गति के लिये (जिन्वतु) = प्रेरित करें। हम वासना - विनाश के द्वारा प्रभु के प्रकाश को देखें और सदा उस प्रकाश में सन्मार्ग पर चलनेवाले हों ।
Connotation: - भावार्थ - इन्द्र की कृपा से हमारा शरीर- गृह सुरक्षित हो, अदिति हमारा कल्याण करे, प्राणसाधना से हमारा जीवन सुखी हो, दीप्त प्रभु के प्रकाश में हम सुवित के मार्ग पर चलें ।