Word-Meaning: - [१] हे जीव ! तू (मित्राय) = मित्र देवता के लिये, अर्थात् स्नेह की भावना के लिये और (वरुणाय) = द्वेष के निवारण के लिये (शिक्ष) = समर्थ होने की इच्छा कर [ शक्+सन्] । तू प्रयत्न कर कि सब के प्रति तेरी स्नेह की भावना हो और किसी से भी तू द्वेष को न करे । [२] ये मित्र और वरुण वे हैं (मा) = जो (दाशुषे) = दाश्वान् के लिये, अपने को मित्र और वरुण के प्रति दे डालनेवाले के लिये (सम्राजा) = उत्तम दीप्ति को देनेवाले हैं। स्नेह व निर्देषता के कारण जीवन दीप्तिमय बनता ही है। ये मित्र और वरुण अपने आराधक के हित करने के कार्य में (मनसा न प्रयुच्छतः) = मन से भी प्रमाद नहीं करते, क्रिया से प्रमाद करने का तो प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता। अप्रमाद से ये अपने आराधक का कल्याण करते हैं । [३] ये मित्र और वरुण वे हैं (ययोः) = जिनका (धाम) = तेज (धर्मणा) = धारक शक्ति से (बृहत् रोचते) = खूब ही चमकता है। मित्र और वरुण हमारा धारण करते हैं और इनके विपरीत कटुता और क्रोध हमारी शक्तियों का नाश करते हैं । द्वेष से मनुष्य अन्दर ही अन्दर जल जाता है। [४] ये मित्र और वरुण वे हैं (ययोः) = जिनके (उभेरोदसी) = दोनों द्युलोक और पृथिवीलोक, अर्थात् मस्तिष्क और शरीर नाधसी ऐश्वर्य सम्पन्न (वृतौ) [वर्तमाने भवतः सा०] होते हैं मित्र और वरुण के आराधन से मस्तिष्क ज्ञान-सम्पन्न होता है और शरीर शक्ति- सम्पन्न होता है । ईर्ष्या, द्वेष व क्रोध ज्ञान और शक्ति दोनों का ही क्षय करते हैं।
Connotation: - भावार्थ- स्नेह व निर्दोषता हमारे जीवन को दीप्त बनाते हैं, हमारे जीवन का धारण करते हैं और हमारे मस्तिष्क को ज्ञान-सम्पन्न व शरीर को शक्ति सम्पन्न करते हैं ।