Word-Meaning: - [१] (ऋतज्ञाः) = ऋत को जाननेवाला, ऋत, अर्थात् यज्ञ व नियमितता को अपने जीवन में अनूदित करनेवाला मैं (हि) = निश्चय से (तेषाम्) = उन देवों के (स्तोमान्) = स्तुतियों को इयर्मि प्राप्त होता हूँ, उन देवों का स्तवन करता हूँ जो देव (मह्ना) = अपनी महिमा से (महताम्) = महान् हैं, (अनर्वणाम्) = हिंसा से रहित हैं और (ऋतावृधाम्) = ऋत का वर्धन करनेवाले हैं। देवों की यहां तीन विशेषताओं का उल्लेख है— [क] सर्वप्रथम वे महान् होते हैं, उनमें तुच्छता व अनुदारता नहीं होती, [ख] वे कभी किसी की हिंसा नहीं करते, उनके कर्म लोकहित के दृष्टिकोण से होते हैं और [ग] ये अपने अन्दर ऋत का वर्धन करते हैं, इनके सब कार्य बड़े नियमित व व्यवस्थित होते हैं। मैं भी इन देवों का स्तवन करता हुआ ऐसा ही बनने का प्रयत्न करता हूँ । [२] (ये) = जो देव (चित्राधसः) = अद्भुत ऐश्वर्यवाले हैं (ते) = वे (सुमित्र्याः) = उत्तम मित्र के कर्मोंवाले देव (महये) = महत्त्व को प्राप्त कराने के लिये (न:) = हमें (अप्सवम्) = उत्तम रूपवाले शरीर को [अप्स रूप, व= वाला] तथा (अर्णवम्) = ज्ञानजलवाले मस्तिष्क को (रासन्ताम्) = प्राप्त करायें, हमारे लिये वे तेजस्वी रूपवाले स्वस्थ शरीर को तथा ज्ञानदीप्त मस्तिष्क को प्राप्त करायें।
Connotation: - भावार्थ - देवों का सम्पर्क हमें भी देव बनायेगा । हम महान्, अहिंसक व नियमित जीवनवाले होंगे। हमें तेजस्वी शरीर व दीप्त मस्तिष्क प्राप्त होगा।