Word-Meaning: - [१] (विश्वे देवा) = सब देव (धीभिः) = उत्तम कर्मों तथा (पुरन्ध्या) = पालक बुद्धि के (सह) = साथ (स्वः) = प्रकाश का (गिरः) - ज्ञान की वाणियों का (ब्रह्म) = प्रभु का (सूक्तम्) = मधुर शब्दों का (जुषेरत) = सेवन करें। देव लोग सदा उत्तम कर्मों को करते हैं, उस बुद्धि का सम्पादन करते हैं जो कि सबका पालन करनेवाली होती है। इनको ये चार वस्तुएँ प्रिय होती हैं- प्रकाश, ज्ञान की वाणियों का अध्ययन, प्रभु का उपासन, मधुर शब्दों का ही उच्चारण । [२] ये देव (मनोः यजत्राः) = ज्ञान का अपने साथ संगतिकरण करनेवाले और ज्ञान- सम्पर्क द्वारा अपना त्राण करनेवाले होते हैं। ज्ञान प्राप्ति के कारण ही (अमृताः) = विषयों के पीछे मरनेवाले नहीं होते। इन सांसारिक विषयों में आसक्ति से ये सदा ऊपर होते हैं । (ऋत-ज्ञाः) = ऋत के जाननेवाले, अर्थात् प्रत्येक कार्य को ठीक समय व ठीक स्थान पर करनेवाले होते हैं । (रातिषाचः) = दान का सेवन करनेवाले होते हैं, दान की वृत्तिवाले होते हैं । (अभिषाचः) = दोनों ओर का सेवन करनेवाले, अर्थात् अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों को सिद्ध करनेवाले होते हैं। इहलोक व परलोक को मिलाकर चलते हैं। (स्वर्विद:) = अपने जीवन के व्यवहार से औरों को प्रकाश के प्राप्त करानेवाले होते हैं। इनका जीवन औरों के लिये मार्गदर्शक बनता है।
Connotation: - भावार्थ- देवों को 'प्रकाश- ज्ञान की वाणियाँ, प्रभु का उपासन व मधुर भाषण' प्रिय होता है।