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त्वष्टा॑रं वा॒युमृ॑भवो॒ य ओह॑ते॒ दैव्या॒ होता॑रा उ॒षसं॑ स्व॒स्तये॑ । बृह॒स्पतिं॑ वृत्रखा॒दं सु॑मे॒धस॑मिन्द्रि॒यं सोमं॑ धन॒सा उ॑ ईमहे ॥

English Transliteration

tvaṣṭāraṁ vāyum ṛbhavo ya ohate daivyā hotārā uṣasaṁ svastaye | bṛhaspatiṁ vṛtrakhādaṁ sumedhasam indriyaṁ somaṁ dhanasā u īmahe ||

Pad Path

त्वष्टा॑रम् । वा॒युम् । ऋ॒भ॒वः॒ । यः । ओह॑ते । दैव्या॑ । होता॑रौ । उ॒षस॑म् । स्व॒स्तये॑ । बृह॒स्पति॑म् । वृ॒त्र॒ऽखा॒दम् । सु॒ऽमे॒धस॑म् । इ॒न्द्रि॒यम् । सोम॑म् । ध॒न॒ऽसाः । ऊँ॒ इति॑ । ई॒म॒हे॒ ॥ १०.६५.१०

Rigveda » Mandal:10» Sukta:65» Mantra:10 | Ashtak:8» Adhyay:2» Varga:10» Mantra:5 | Mandal:10» Anuvak:5» Mantra:10


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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ऋभवः) हे मेधावी विद्वानों ! (यः) जो (त्वष्टारम्) सूर्य को (वायुम्) वायु को (दैव्या होतारौ) इन दोनों अमानुष होताओं को (उषसम्) उषा को (स्वस्तये-ओहते) कल्याण के लिए आह्वान करता है-सेवन करता है (वृत्रखादं सुमेधसं बृहस्पतिम्) पापनाशक उत्तम सङ्गतिवाले परमात्मा को (इन्द्रियं सोमं धनसाः-उ-ईमहे) आत्मा के कल्याण निमित्त शान्त परमात्मा की अध्यात्मधन का सेवन करनेवाले हम अवश्य याचना करते हैं ॥१०॥
Connotation: - मेधावी जन प्रतिदिन उषा वेला में अग्नि और वायु के द्वारा होम सम्पादन करें, स्वास्थ्य रक्षा के लिए। अध्यात्मयज्ञ अर्थात् संध्या के द्वारा परमात्मा की उपासना करके अध्यात्मधन-आत्मशान्ति का लाभ लें ॥१०॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

त्वष्टा व बृहस्पति की प्राप्ति

Word-Meaning: - [१] (धनसाः) = उचित धनों का संभजन करनेवाले हम (उ) = निश्चय से (सोमम्) = सोम से (त्वष्टारं वायुम्) = उस निर्माता गतिशील प्रभु को (ईमहे) = याचना करते हैं। शरीर में सोम [= वीर्य ] के रक्षण के द्वारा हम सृष्टि निर्माता गतिशील प्रभु को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रभु की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि हम भी निर्माता बनें, उस निर्माण के लिये गतिशील हों। [२] (ऋभवः) = ऋत से दीप्त होनेवाले हम अपने सब कार्यों को नियमितता से करनेवाले हम उस सोम से प्रार्थना करते हैं (यः) = जो (स्वस्तये) = हमारे कल्याण के लिये (दैव्या होतारा) = दैव्य होताओं, अर्थात् जीवनयज्ञ के चलानेवाले प्राणापानों को तथा (उषसम्) = उषा को (ओहते) = प्राप्त कराता है । सोम के रक्षण से प्राणापान की शक्ति तो बढ़ती ही है, इससे हमारे जीवन में उषा का उदय होता है । उषा घोर अन्धकार का नाश करती हुई आती है, उसी प्रकार सोमरक्षण से हमारी बुद्धि का विकास होकर अज्ञानान्धकार का नाश होता है। एवं सोमरक्षण शक्ति व ज्ञान' दोनों का वर्धन करता है ।[३] हम इस सोम से (बृहस्पतिम्) = सर्वोत्कृष्ट ज्ञान के पति (वृत्रखादम्) = वासना रूप वृत्र को नष्ट करनेवाले (सुमेधसम्) = [ शोभना मेधा यस्मात्] उत्तम मेधा को देनेवाले प्रभु को माँगते हैं । वीर्यरक्षण हमें उस ज्ञान के पति प्रभु का दर्शन कराता है, परिणामतः हमारी वासनाएँ नष्ट होती हैं और हमें मेधा की प्राप्ति होती है । [४] मेधा के साथ (इन्द्रियम्) = इन्द्रिय शक्ति को हम माँगते हैं। सोमरक्षण से ही तो सब इन्द्रियाँ सशक्त बनती हैं। 'इन्द्रियं वीर्यं बलम्' ये सब शब्द समानार्थक हैं। सोमरक्षण से सब इन्द्रियाँ अपना-अपना कार्य करने में समर्थ बनी रहती हैं।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से हम निर्माता प्रभु की ओर झुकते हैं, प्राणापान की शक्ति को बढ़ाकर अज्ञानान्धकार को दूर कर पाते हैं, ज्ञानी प्रभु से मेधा को प्राप्त करते हैं और सब इन्द्रिय शक्तियों को स्थिर रखते हैं ।
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BRAHMAMUNI

Word-Meaning: - (ऋभवः) हे मेधाविनः ! “ऋभुः-मेधाविनाम” [निघ० ३।१५] (यः) यः खलु (त्वष्टारम्) सूर्यं (वायुम्) वायुं (दैव्या होतारौ) एतौ-अमानुषौ होतारौ (उषसम्) उषो नाम्नीं (स्वस्तये-ओहते) कल्याणाय-आवहति सेवते (वृत्रखादं सुमेधसं बृहस्पतिम्) पापभक्षकं पापनाशकं शोभनमेधसं शोभनसङ्गतिवन्तं परमात्मानं (इन्द्रियं सोमं धनसाः-उ-ईमहे) आत्मनः कल्याणनिमित्तं शान्तं परमात्मानमध्यात्मधनसम्भाजका वयमवश्यं याचामहे ॥१०॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O learned scholars of the science of yajna, for our achievement of wealth and all round well being, let us study and adore Tvashta, the specific natural energy that creates and shapes the forms of life, Vayu, wind and electric energy, the solar energy of the dawn, the vast space, the catalytic force that breaks the cloud and the soma energy which energises the heavenly yajakas, prana and apana, and enhances the efficacy of brain and the senses.