त्वष्टा व बृहस्पति की प्राप्ति
Word-Meaning: - [१] (धनसाः) = उचित धनों का संभजन करनेवाले हम (उ) = निश्चय से (सोमम्) = सोम से (त्वष्टारं वायुम्) = उस निर्माता गतिशील प्रभु को (ईमहे) = याचना करते हैं। शरीर में सोम [= वीर्य ] के रक्षण के द्वारा हम सृष्टि निर्माता गतिशील प्रभु को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रभु की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि हम भी निर्माता बनें, उस निर्माण के लिये गतिशील हों। [२] (ऋभवः) = ऋत से दीप्त होनेवाले हम अपने सब कार्यों को नियमितता से करनेवाले हम उस सोम से प्रार्थना करते हैं (यः) = जो (स्वस्तये) = हमारे कल्याण के लिये (दैव्या होतारा) = दैव्य होताओं, अर्थात् जीवनयज्ञ के चलानेवाले प्राणापानों को तथा (उषसम्) = उषा को (ओहते) = प्राप्त कराता है । सोम के रक्षण से प्राणापान की शक्ति तो बढ़ती ही है, इससे हमारे जीवन में उषा का उदय होता है । उषा घोर अन्धकार का नाश करती हुई आती है, उसी प्रकार सोमरक्षण से हमारी बुद्धि का विकास होकर अज्ञानान्धकार का नाश होता है। एवं सोमरक्षण शक्ति व ज्ञान' दोनों का वर्धन करता है ।[३] हम इस सोम से (बृहस्पतिम्) = सर्वोत्कृष्ट ज्ञान के पति (वृत्रखादम्) = वासना रूप वृत्र को नष्ट करनेवाले (सुमेधसम्) = [ शोभना मेधा यस्मात्] उत्तम मेधा को देनेवाले प्रभु को माँगते हैं । वीर्यरक्षण हमें उस ज्ञान के पति प्रभु का दर्शन कराता है, परिणामतः हमारी वासनाएँ नष्ट होती हैं और हमें मेधा की प्राप्ति होती है । [४] मेधा के साथ (इन्द्रियम्) = इन्द्रिय शक्ति को हम माँगते हैं। सोमरक्षण से ही तो सब इन्द्रियाँ सशक्त बनती हैं। 'इन्द्रियं वीर्यं बलम्' ये सब शब्द समानार्थक हैं। सोमरक्षण से सब इन्द्रियाँ अपना-अपना कार्य करने में समर्थ बनी रहती हैं।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से हम निर्माता प्रभु की ओर झुकते हैं, प्राणापान की शक्ति को बढ़ाकर अज्ञानान्धकार को दूर कर पाते हैं, ज्ञानी प्रभु से मेधा को प्राप्त करते हैं और सब इन्द्रिय शक्तियों को स्थिर रखते हैं ।